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तीर्थनगरी से गायब हुए दशनामी झोली के खरीदार
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स्वर्गाश्रम क्षेत्र में दशनामी झोली के साथ बाबा सुरेश गिरी।
- फोटो : RISHIKESH
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ऋषिकेश। तीर्थनगरी लक्ष्मणझूला, स्वर्गाश्रम में विदेशी पर्यटकों की चहलकदमी कम हो गई है। कोरोना के कारण बीते अप्रैल महीने से अब तक क्षेत्र में गिने-चुने पर्यटक ही ठहरे हुए हैं। विदेशी पर्यटकों की चहलकदमी कम होने से लक्ष्मणझूला, स्वर्गाश्रम क्षेत्र में स्थानीय व्यापारियों का कारोबार कछुए गति से चल रहा है। यही कारण है कि इन दिनों क्षेत्र में दशनामी झोली के खरीदार भी कम हो गए हैं।
श्री पंचदशानंद जूना अखाड़ा हरिद्वार के सुरेश गिरी ने बताया कि वह कई वर्षों से हरिद्वार और स्वर्गाश्रम क्षेत्र में दशनामी झोली को बनाकर उसे बेचते हैं। उनकी इस झोली के खरीदार विदेशी पर्यटक ही होते हैं। विदेशी पर्यटक ही उन्हें इस झोली का उचित मूल्य देते हैं। जब से कोरोना के कारण अंतरराष्ट्रीय सेवाएं बाधित हुई हैं, तब से क्षेत्र में दशनामी झोली के खरीदार गायब हो गए हैं।
क्या है दशनामी झोली
ऋषिकेश। सुरेश गिरी ने बताया कि कपड़े और ऊन की मदद से दशनामी झोली को बनाया जाता है। एक झोली को बनाने के लिए एक महीने से अधिक का समय लग जाता है। उस झोली की कीमत पांच से छह हजार रुपये होती है। कहा एक से दो हजार रुपये तक का खर्चा झोली को ही बनाने में लग जाता है। यह बहुत ही मजबूत और टिकाऊ झोली होती है, विदेशी पर्यटक ही इस झोली के खरीदार होते हैं। झोली के अलावा वह ऊन से कमर पट्टा, छोटा पर्स भी तैयार करते हैं।
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श्री पंचदशानंद जूना अखाड़ा हरिद्वार के सुरेश गिरी ने बताया कि वह कई वर्षों से हरिद्वार और स्वर्गाश्रम क्षेत्र में दशनामी झोली को बनाकर उसे बेचते हैं। उनकी इस झोली के खरीदार विदेशी पर्यटक ही होते हैं। विदेशी पर्यटक ही उन्हें इस झोली का उचित मूल्य देते हैं। जब से कोरोना के कारण अंतरराष्ट्रीय सेवाएं बाधित हुई हैं, तब से क्षेत्र में दशनामी झोली के खरीदार गायब हो गए हैं।
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क्या है दशनामी झोली
ऋषिकेश। सुरेश गिरी ने बताया कि कपड़े और ऊन की मदद से दशनामी झोली को बनाया जाता है। एक झोली को बनाने के लिए एक महीने से अधिक का समय लग जाता है। उस झोली की कीमत पांच से छह हजार रुपये होती है। कहा एक से दो हजार रुपये तक का खर्चा झोली को ही बनाने में लग जाता है। यह बहुत ही मजबूत और टिकाऊ झोली होती है, विदेशी पर्यटक ही इस झोली के खरीदार होते हैं। झोली के अलावा वह ऊन से कमर पट्टा, छोटा पर्स भी तैयार करते हैं।
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