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विदेश जाकर भी कम नहीं हुआ राजेंद्र का गढ़वाली प्रेम
नवीन नौटियाल /अमर उजाला, ऋषिकेश
Updated Thu, 28 Jul 2016 01:43 AM IST
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गढ़वाल प्रेम
- फोटो : amar ujala
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तीन साल पहले टिहरी के राजेंद्र ने हांगकांग की एक शिप कंपनी ज्वाइन कर सात समंदर पार चले गए। पर गढ़वाली भाषा, संस्कृति के लिए उनको दिल हर वक्त धड़कता है। यही वजह है कि वो वहां रहते हुए भी गढ़वाली को सहेजने के प्रयास में लगे रहते हैं। अपनी कमाई का अधिकतर हिस्सा वे इसी काम में लगाते है।
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उनके इस प्रयास को उत्तराखंड फिल्म एंड रेडियो एसोसिएशन ने भी सराहा। हाल ही में एसोसिएशन ने उनको गढ़वाली गीतों में अभिनय के लिए बेस्ट एक्टर आफ द ईयर से नवाजा। समारोह में मुख्यमंत्री ने उनको सम्मानित किया।
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अमर उजाला संवाददाता से बातचीत में उन्होंने बताया कि आज उत्तराखंड का युवा अपनी भाषा, सभ्यता से परहेज कर रहा है। जिसका सबसे बड़ा कारण भाषा का सही तरीके से प्रचार-प्रसार न हो पाना है। कहते हैं कि किसी भी भाषा, सभ्यता और संस्कृति को बेहतर गीतों के माध्यम से लोगों के बीच पहुंचाया जा सकता है। पर गीतों में बेहूदा शब्दों के प्रयोग से श्रोताओं की संख्या में कमी आई है। कहा कि अभिभावकों को भी घरों में गढ़वाली बोल कर बच्चों को भाषा का ज्ञान देना चाहिए।
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सोशल मीडिया पर देंगे गढ़वाली की शिक्षा
साल भर में दो माह उत्तराखंड में रहकर पहाड़ी पहचान जनमंच के बैनर तले राजेंद्र गढ़वाली का खूब प्रचार प्रसार करते हैं। वो कई गढ़वाली गीतों में भी अभिनय कर चुकें है। एक बार काफी नुकसान होने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। कहा कि वर्तमान युग में सोशल मीडिया का क्रेज बढ़ा है। इसीलिए अब वे उत्तराखंड के युवाओं को फेसबुक, व्हाट्सअप, यू ट्यूब आदि के माध्यम से गढ़वाली भाषा, संस्कृति और सभ्यता का ककहरा सिखाएंगे।