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भारत में 3.40 करोड़ लोगों के लिए हर सांस एक चुनौती : प्रो. मीनू सिंह

Mon, 11 May 2026 01:16 AM IST
देहरादून ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, ऋषिकेश
संवाद न्यूज एजेंसी, ऋषिकेश Updated Mon, 11 May 2026 01:16 AM IST
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Every breath is a challenge for 34 million people

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अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की कार्यकारी निदेशक और पीडियाट्रिक्स पल्मोनोलॉजिस्ट प्रो. मीनू सिंह ने देश में अस्थमा की गंभीर स्थिति पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि जहां सामान्य लोगों के लिए सांस लेना एक सहज क्रिया है, वहीं भारत के लगभग 3.40 करोड़ अस्थमा मरीजों के लिए हर सांस एक संघर्ष है। प्रो. सिंह के अनुसार, अस्थमा से पीड़ित प्रत्येक व्यक्ति के लिए सूजनरोधी इनहेलर की सुलभ पहुंच एक अत्यावश्यक आवश्यकता बनी हुई है।

प्रो. मीनू सिंह ने बताया कि भारत में अस्थमा मरीजों के घरों में अक्सर नीला रिलीवर इनहेलर (जो तुरंत राहत देता है) तो मिल जाता है, लेकिन भूरा या बैंगनी कंट्रोलर इनहेलर (जो बीमारी की जड़ यानी सूजन और बलगम का इलाज करता है) नदारद रहता है। यह एक चिंताजनक प्रवृत्ति है, क्योंकि निदान किए गए अस्थमा रोगियों में से केवल 10 प्रतिशत से भी कम को इनहेल्ड कॉर्टिकोस्टेरॉइड उपचार मिल रहा है, जबकि चिकित्सा दिशानिर्देशों में इसे दीर्घकालिक नियंत्रण के लिए अनिवार्य बताया गया है।
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विशेषज्ञों का मानना है कि नीला रिलीवर इनहेलर एक अग्निशामक यंत्र की तरह काम करता है, जो दौरे पड़ने पर तत्काल राहत प्रदान करता है। इसके विपरीत, कंट्रोलर इनहेलर बीमारी के मूल कारण, यानी फेफड़ों में होने वाली सूजन और बलगम को नियंत्रित करता है। केवल रिलीवर पर निर्भर रहना आग जलते रहने के दौरान केवल धुएं का इलाज करने जैसा है। कई मरीज बेहतर महसूस करते ही कंट्रोलर इनहेलर का उपयोग बंद कर देते हैं, जो खतरनाक है क्योंकि अस्थमा में साइलेंट इन्फ्लेमेशन (शांत सूजन) असली खतरा पैदा करता है। इसके कारण कई बार हफ्तों तक सामान्य रहने के बाद अचानक गंभीर दौरा पड़ सकता है।
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ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की कमी

प्रो. मीनू सिंह ने इस समस्या को ग्रामीण इलाकों में और भी गंभीर बताया, जहां प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की कमी है। इसके अतिरिक्त वाहनों से निकलने वाला पीएम 2.5 कण और बायोमास ईंधन का धुआं अस्थमा को ट्रिगर करने वाले प्रमुख कारक बन रहे हैं। बढ़ते प्रदूषण के इस दौर में सही इलाज और प्रभावी तकनीक की आवश्यकता और भी बढ़ गई है।

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वैश्विक दिशानिर्देश और बुनियादी देखभाल

2026 के ग्लोबल इनिशिएटिव फॉर अस्थमा के दिशा-निर्देश स्पष्ट रूप से कहते हैं कि प्री-स्कूल बच्चों सहित लगभग सभी अस्थमा मरीजों के लिए इनहेल्ड कॉर्टिकोस्टेरॉइड आवश्यक हैं। यह केवल गंभीर मामलों के लिए ही नहीं, बल्कि अस्थमा की बुनियादी देखभाल का एक अभिन्न अंग है।

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इनहेलर के सही उपयोग में भी कमी

एम्स की पीडियाट्रिक्स पल्मोनरी एसआर डॉ. खुशबू तनेजा ने एक और महत्वपूर्ण पहलू पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि जिनके पास सही दवा उपलब्ध है, उनमें से भी 70 से 90 प्रतिशत मरीज इनहेलर का सही इस्तेमाल नहीं करते हैं। सांस लेने से पहले पूरी सांस न छोड़ना, दवा लेने के बाद उसे कुछ देर रोककर न रखना, या जल्दबाजी करना, इन गलतियों के कारण दवा फेफड़ों तक पहुंचने के बजाय गले में ही रह जाती है।


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अंतर को पाटना ही लक्ष्य

भारत में समस्या केवल इलाज के अभाव की नहीं है, बल्कि दवा की क्षमता और मरीजों को मिल रहे उपचार के बीच एक बड़े अंतर की है। विश्व अस्थमा दिवस का असली उद्देश्य इसी अंतर को पाटना और यह सुनिश्चित करना है कि हर अस्थमा मरीज को सही उपचार और सही जानकारी मिले, ताकि वे एक सामान्य जीवन जी सकें।
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