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गो सेवा को ‘धर्म’ मानते हैं ‘यादव’
manoj singh rana
Updated Sat, 13 Aug 2016 01:13 AM IST
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गो सेवा
- फोटो : amar ujala
गो सेवा उनके लिए धर्म है। वह समाज और देश में उन लोगों के लिए किसी नजीर से कम नहीं हैं, जो अपनी राजनीति चमकाने के लिए गो सेवा पर आए दिन बयानबाजी करते हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं तीर्थ नगरी स्वर्गाश्रम क्षेत्र में रहने वाले धर्म यादव उर्फ गुरु जी की। जो बीते 15 वर्षों से निस्वार्थ गो सेवा कर रहे हैं।
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अपना जीवन गो सेवा को समर्पित कर चुके धर्म यादव कहते हैं कि बिना गाय की कोई सेवा नहीं है। गाय है तो धर्म है। गाय पशु नहीं भगवान है, और इसकी सेवा करने वाला व्यक्ति हमेशा प्रसन्न रहता है। इलाहाबाद, प्रयागराज में जन्मे धर्म यादव बचपन से ही अपने माता-पिता के स्नेह से वंचित हो गए थे। मात्र पांच वर्ष की आयु से वह इलाहाबाद में गो सेवा में जुट गए।
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गो सेवा के साथ ही वह गीता, उपनिषद, वेदांत और योग के ज्ञाता बन गए। गो सेवा के चलते उन्होंने बैराग्य जीवन धारण कर दिया।
दशकभर इलाहाबाद में गो सेवा के बाद वर्ष 2000 में उन्होंने तीर्थनगरी स्वर्गाश्रम का रुख किया। इसके बाद से वह लोगों को वेदांत, गीता, उपनिषद का पाठ पढ़ाने के साथ गो सेवा का संदेश दे रहे हैं।
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गुरुजी बताते हैं कि वर्तमान में उनके पास गाय, बछड़ों को मिलाकर 100 जानवर हैं। जिनकी वह बीते 15 वर्षों से सेवा करते आ रहे हैं। उन्होंने बताया वह इन गायों को समय-समय पर चारा, औषधि और चिकित्सा उपचार उपलब्ध करवाते रहते हैं।
गीता, उपनिषद, वेद और योग से निकालता है जानवरों का खर्चा
ऋषिकेश। गो सेवक धर्म यादव ने बताया कि गो पालन में उनका मासिक खर्चा करीब एक लाख रुपये पहुंच जाता है। आश्रम में वह वयस्क, बुजुर्ग, लोगों को गीता, उपनिषद, वेद और योगाभ्यास करवाते हैं। जिनसे उनका गुजर बसर होता है। उन्होंने बताया कि उनके पास गीता, उपनिषद, वेद और योग को सीखने के लिए देश, विदेशों से लोग आते हैं।