{"_id":"5d13d2278ebc3e3ce13ae83f","slug":"15615800523-rishikesh-news23","type":"story","status":"publish","title_hn":"पुराना बस अड्डा भूमि पर शुरू हुई मालिकाना हक की रार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पुराना बस अड्डा भूमि पर शुरू हुई मालिकाना हक की रार
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
ब्यूरो/अमर उजाला/ऋषिकेश।
तिलक मार्ग स्थित पुराना बस अड्डा की भूमि पर मालिकाना हक का विवाद छिड़ गया है। मेयर ने आदेश जारी किया है कि उक्त भूमि का अनापत्ति प्रमाणपत्र तब तक जारी न किया जाए जब तक कि स्वामित्व का निर्णय नहीं हो जाता। इसके अलावा हरिद्वार रुड़की विकास प्राधिकरण को भी पत्र भेजकर नक्शा पारित न करने की सिफारिश भी की है।
तिलक मार्ग स्थित संपत्ति संख्या-83 पर इन दिनों आलीशान भवन का निर्माण शुरू कर दिया गया है। नगर निगम का दावा है कि उक्त भूमि निगम की संपत्ति है। उधर, मंदिर श्री भरत जी महाराज की दलील है कि पूर्व में यहां से उत्तर प्रदेश परिवहन निगम का दफ्तर संचालित होता था। उक्त भूमि किराए ट्रस्ट की ओर से किराए पर दी गई थी। इसे 2010 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पुन: प्राप्त कर लिया गया। निगम के दस्तावेजों के मुताबिक संपत्ति संख्या-83 पिछले 1987 से जनरल मैनेजर राजकीय परिवहन विभाग के नाम दर्ज होता आ रहा है। भरत मंदिर ट्रस्ट ने दावा किया है कि उक्त संपत्ति को दोबारा उनके नाम निगम के दस्तावेजों में नामांतरित की जाए। दावे से संबंधित कई दस्तावेज भी लगाए गए हैं।
निगम के अफसरों ने ही रची संपत्ति खुर्दबुर्द करने की साजिश
ऋषिकेश। संपत्ति संख्या-83 पर स्वामित्व को लेकर छिड़ी रार के बीच यह तथ्य भी उभर कर आया है कि नगर निगम के ही कुछ अफसर ही संलिप्त हैं। इसका खुलासा विभागीय पत्रावलियों और टिप्पणियों से हुआ है। मामले में निगम की ताजा आख्या के मुताबिक 14 सितंबर 2017 को महंत अशोक प्रपन्न शर्मा की ओर से नामांतरण आवेदन प्रस्तुत किया गया। तत्कालीन पालिकाध्यक्ष को संबोधित पत्र में सुप्रीम कोर्ट और सिविल जज के निर्णय और खतौनी की छायाप्रति प्रस्तुत की गई। गृह कर विभाग की आख्या में कहा गया है कि उक्त नामांतरण आवेदन को सक्षम अधिकारी के समक्ष न प्रस्तुत ही नहीं किया गया। इसके उलट कर अधीक्षक ने भवन कर लिपिक को भेज दिया। इसी तरह 14 मई 2018 को भी महंत अशोक प्रपन्न शर्मा की ओर से किये गए नामांतरण आवेदन को कार्यालय में दर्ज किए बिना ही भवन कर विभाग को पृष्ठांकित कर दिया गया।
विज्ञापन
कोर्ट के आदेशों में संपत्ति संख्या-83 का उल्लेख ही नहीं
ऋषिकेश। आख्या में स्पष्ट किया गया है कि निगम के अभिलेखों में संपत्ति संख्या-83 जनरल मैनेजर, राजकीय परिवहन विभाग के नाम से दर्ज चली आ रही है। सर्वोच्च न्यायालय और सिविल जज के आदेशों में तिलक मार्ग का उल्लेख ही नहीं है। महंत की ओर से आवेदन पत्र में खतौनी की छायाप्रति भी संलग्न की गई है। इनमें 109 खसरों का जिक्र है। पेंच ये है कि संपत्ति किन खसरा नंबर पर अंकित है इसका उल्लेख ही नहीं है। इतना ही नहीं हाईकोर्ट के निर्णय की प्रति भी निगम के दस्तावेजों में उपलब्ध नहीं है। निगम का दावा है कि मुहैया कराए गए दस्तावेजों से स्पष्ट है कि संपत्ति संख्या-83 तिलक मार्ग महंत अशोक प्रपन्न शर्मा की नहीं है। आख्या में कर अधीक्षक की भूमिका पर भी सवाल उठाया गया है। इसके मुताबिक 15 मई 2018 को कर अधीक्षक ने पक्षपात पूर्ण ढंग से पत्र जारी कर दिया कि नामांतरण प्रक्रिया जारी है।
चार अलमारियों से संपत्ति के अहम दस्तावेज गायब
ऋषिकेश। निगम के रिकार्ड रूप से चार अलमारियों से संपत्ति संबंधी सभी दस्तावेज गायब हो गए हैं। इनमें संपत्ति संख्या-83 की फाइल भी शामिल है। उक्त संपत्ति से जुड़े 44 पेज लापता हैं। ये वही दस्तावेज हैं जिसमें उल्लेख किया गया है कि ग्राम सभा से निगम को उक्त भूमि प्राप्त हुई थी। बताया जा रहा है कि रिकार्ड रूम के पूर्व अधीक्षक ने एक एक करके निगम की सैकड़ों फाइलें गायब कर दीं। इस मामले में निगम की ओर से अब तक कोई मामला भी नहीं दर्ज कराया गया है। उधर, निगम के सहायक अभियंता पर आरोप है कि मेयर और मुख्य नगर आयुक्त की ओर से पुराने बस अड्डे की फाइल तलब करने पर कई दिनों तक दबाए रखा गया। आखिरकार कई बार टोकने के बाद फाइल बाहर आ पाई।
मामले में मेयर अनिता ममगाईं ने कोई बयान देने में असमर्थता जाहिर की है। दूसरी ओर नगर आयुक्त चतर सिंह चौहान से वार्ता करने की कोशिश की गई, लेकिन संपर्क नहीं हो पाया। इस संदर्भ में नगर निगम की ओर से पक्ष आने पर उसे भी प्रकाशित किया जाएगा।
मेयर जबरन पैदा कर रहीं विवाद
ऋशिकेश। उधर, मंदिर श्री भरत जी महराज की ओर से हर्षवर्धन शर्मा का कहना है कि मेयर जबरदस्ती स्वामित्व संबंधी विवाद पैदा कर रही हैं। यदि निगम को कोई एतराज है तो वह मुझे लिखित रूप में स्पष्ट करें कि संपत्ति मंदिर श्री भरत जी महराज की नहीं है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से भी हमारे पक्ष में फैसला आ चुका है। यदि निगम को लगता है कि संपत्ति ग्राम सभा से उसे मिली है तो दस्तावेज दिखाए। जबरन ब्लैकमेलिंग के लिए किसी संपत्ति में विवाद खड़ा करना न्यायसंगत नहीं है।
विज्ञापन
तिलक मार्ग स्थित पुराना बस अड्डा की भूमि पर मालिकाना हक का विवाद छिड़ गया है। मेयर ने आदेश जारी किया है कि उक्त भूमि का अनापत्ति प्रमाणपत्र तब तक जारी न किया जाए जब तक कि स्वामित्व का निर्णय नहीं हो जाता। इसके अलावा हरिद्वार रुड़की विकास प्राधिकरण को भी पत्र भेजकर नक्शा पारित न करने की सिफारिश भी की है।
तिलक मार्ग स्थित संपत्ति संख्या-83 पर इन दिनों आलीशान भवन का निर्माण शुरू कर दिया गया है। नगर निगम का दावा है कि उक्त भूमि निगम की संपत्ति है। उधर, मंदिर श्री भरत जी महाराज की दलील है कि पूर्व में यहां से उत्तर प्रदेश परिवहन निगम का दफ्तर संचालित होता था। उक्त भूमि किराए ट्रस्ट की ओर से किराए पर दी गई थी। इसे 2010 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पुन: प्राप्त कर लिया गया। निगम के दस्तावेजों के मुताबिक संपत्ति संख्या-83 पिछले 1987 से जनरल मैनेजर राजकीय परिवहन विभाग के नाम दर्ज होता आ रहा है। भरत मंदिर ट्रस्ट ने दावा किया है कि उक्त संपत्ति को दोबारा उनके नाम निगम के दस्तावेजों में नामांतरित की जाए। दावे से संबंधित कई दस्तावेज भी लगाए गए हैं।
विज्ञापन
निगम के अफसरों ने ही रची संपत्ति खुर्दबुर्द करने की साजिश
ऋषिकेश। संपत्ति संख्या-83 पर स्वामित्व को लेकर छिड़ी रार के बीच यह तथ्य भी उभर कर आया है कि नगर निगम के ही कुछ अफसर ही संलिप्त हैं। इसका खुलासा विभागीय पत्रावलियों और टिप्पणियों से हुआ है। मामले में निगम की ताजा आख्या के मुताबिक 14 सितंबर 2017 को महंत अशोक प्रपन्न शर्मा की ओर से नामांतरण आवेदन प्रस्तुत किया गया। तत्कालीन पालिकाध्यक्ष को संबोधित पत्र में सुप्रीम कोर्ट और सिविल जज के निर्णय और खतौनी की छायाप्रति प्रस्तुत की गई। गृह कर विभाग की आख्या में कहा गया है कि उक्त नामांतरण आवेदन को सक्षम अधिकारी के समक्ष न प्रस्तुत ही नहीं किया गया। इसके उलट कर अधीक्षक ने भवन कर लिपिक को भेज दिया। इसी तरह 14 मई 2018 को भी महंत अशोक प्रपन्न शर्मा की ओर से किये गए नामांतरण आवेदन को कार्यालय में दर्ज किए बिना ही भवन कर विभाग को पृष्ठांकित कर दिया गया।
विज्ञापन
कोर्ट के आदेशों में संपत्ति संख्या-83 का उल्लेख ही नहीं
ऋषिकेश। आख्या में स्पष्ट किया गया है कि निगम के अभिलेखों में संपत्ति संख्या-83 जनरल मैनेजर, राजकीय परिवहन विभाग के नाम से दर्ज चली आ रही है। सर्वोच्च न्यायालय और सिविल जज के आदेशों में तिलक मार्ग का उल्लेख ही नहीं है। महंत की ओर से आवेदन पत्र में खतौनी की छायाप्रति भी संलग्न की गई है। इनमें 109 खसरों का जिक्र है। पेंच ये है कि संपत्ति किन खसरा नंबर पर अंकित है इसका उल्लेख ही नहीं है। इतना ही नहीं हाईकोर्ट के निर्णय की प्रति भी निगम के दस्तावेजों में उपलब्ध नहीं है। निगम का दावा है कि मुहैया कराए गए दस्तावेजों से स्पष्ट है कि संपत्ति संख्या-83 तिलक मार्ग महंत अशोक प्रपन्न शर्मा की नहीं है। आख्या में कर अधीक्षक की भूमिका पर भी सवाल उठाया गया है। इसके मुताबिक 15 मई 2018 को कर अधीक्षक ने पक्षपात पूर्ण ढंग से पत्र जारी कर दिया कि नामांतरण प्रक्रिया जारी है।
चार अलमारियों से संपत्ति के अहम दस्तावेज गायब
ऋषिकेश। निगम के रिकार्ड रूप से चार अलमारियों से संपत्ति संबंधी सभी दस्तावेज गायब हो गए हैं। इनमें संपत्ति संख्या-83 की फाइल भी शामिल है। उक्त संपत्ति से जुड़े 44 पेज लापता हैं। ये वही दस्तावेज हैं जिसमें उल्लेख किया गया है कि ग्राम सभा से निगम को उक्त भूमि प्राप्त हुई थी। बताया जा रहा है कि रिकार्ड रूम के पूर्व अधीक्षक ने एक एक करके निगम की सैकड़ों फाइलें गायब कर दीं। इस मामले में निगम की ओर से अब तक कोई मामला भी नहीं दर्ज कराया गया है। उधर, निगम के सहायक अभियंता पर आरोप है कि मेयर और मुख्य नगर आयुक्त की ओर से पुराने बस अड्डे की फाइल तलब करने पर कई दिनों तक दबाए रखा गया। आखिरकार कई बार टोकने के बाद फाइल बाहर आ पाई।
मामले में मेयर अनिता ममगाईं ने कोई बयान देने में असमर्थता जाहिर की है। दूसरी ओर नगर आयुक्त चतर सिंह चौहान से वार्ता करने की कोशिश की गई, लेकिन संपर्क नहीं हो पाया। इस संदर्भ में नगर निगम की ओर से पक्ष आने पर उसे भी प्रकाशित किया जाएगा।
मेयर जबरन पैदा कर रहीं विवाद
ऋशिकेश। उधर, मंदिर श्री भरत जी महराज की ओर से हर्षवर्धन शर्मा का कहना है कि मेयर जबरदस्ती स्वामित्व संबंधी विवाद पैदा कर रही हैं। यदि निगम को कोई एतराज है तो वह मुझे लिखित रूप में स्पष्ट करें कि संपत्ति मंदिर श्री भरत जी महराज की नहीं है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से भी हमारे पक्ष में फैसला आ चुका है। यदि निगम को लगता है कि संपत्ति ग्राम सभा से उसे मिली है तो दस्तावेज दिखाए। जबरन ब्लैकमेलिंग के लिए किसी संपत्ति में विवाद खड़ा करना न्यायसंगत नहीं है।