बेल्जियम से PM मोदी एक्टीवेट करेंगे एशिया की सबसे बड़ी दूरबीन
- 2450 मी. की ऊंचाई पर स्थापित की गई है दूरबीन
- 3.6 मी. व्यास का है देवस्थल में स्थापित टेलीस्कोप
- 360 डिग्री कोण पर घूम कर सकता है विस्तृत अध्ययन
- 7 फीसदी अंशदान टेलीस्कोप की स्थापना में बेल्जियम का
- इसकी स्थापना में जर्मनी, रूस भी खासा योगदान
- धुंधले दिखने वाले तारों के अध्ययन में महत्वपूर्ण
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नैनीताल में ओखलकांडा ब्लॉक के देवस्थल में स्थापित एशिया की सबसे बड़ी दूरबीन (टेलीस्कोप) को 30 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेल्जियम से बटन दबाकर एक्टीवेट करेंगे।
उत्तराखंड के देवस्थल में इसकी तैयारी शुरू हो गई हैं। एरीज के वैज्ञानिक और इंजीनियरों की टीम ने सोमवार को देवस्थल पहुंचकर टेलीस्कोप को चालू कराने संबंधी तैयारियों का जायजा भी लिया। दूरदर्शन और एनआईसी की टीम भी देवस्थल पहुंच गई है। मंगलवार को एरीज से कुछ और वैज्ञानिक और इंजीनियर देवस्थल पहुंचेंगे।
सोमवार को कंप्यूटर इंजीनियर संजीव साहू के साथ देवस्थल पहुंचे एरीज से वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. बृजेश कुमार ने बताया कि जिस वक्त प्रधानमंत्री दूरबीन को एक्टीवेट करेंगे, उस वक्त के कार्यक्रम का पांच मिनट का देवस्थल में दूरदर्शन के सहयोग से पांच मिनट का लाइव टेलीकास्ट किया जाएगा।
इंटरनेट कनेक्टिविटी और टेलीस्कोप कंट्रोल की जांच हुई
सोमवार को देवस्थल में इंटरनेट कनेक्टिविटी और टेलीस्कोप कंट्रोल की जांच की गई। सूचना प्रौद्योगिकी की मदद से देवस्थल को मनोरा पीक से जोड़ा जा चुका है। मनोरा पीक से कंप्यूटर इंजीनियर मोहित कुमार जोशी इस कार्य में जुटे हुए हैं।
मालूम हो कि 2450 मीटर की ऊंचाई में स्थित देवस्थल में वर्ष 2007 में इस दूरबीन को लगाने का काम शुरू हुआ था। 3.6 मीटर व्यास का यह टेलीस्कोप 360 डिग्री के कोण पर घूमकर किसी भी बिंदु पर स्थिर होकर आकाश का विस्तृत अध्ययन करने के लिए तैयार है।
इस टेलीस्कोप की स्थापना में जर्मनी, रूस और बेल्जियम का खासा योगदान रहा है। इसके लैंस को तैयार करने में बेल्जियम के वैज्ञानिकों की अहम भूमिका रही। टेलीस्कोप में सात फीसदी अंशदान भी बेल्जियम का है। एरीज के वैज्ञानिक डा. बृजेश कुमार ने बताया कि यह दूरबीन धुंधले नजर आने वाले तारों, नई आकाश गंगाओं और दूरस्थ तारों के समूह के अध्ययन में विशेष रूप से महत्वपूर्ण साबित होगा।