नार्वे के सिंद्रे वेटविक का पूरा परिवार सीख गया हिंदी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
नार्वे के फ्रेडरिंकस्टेड शहर के निवासी सिंद्रे वेटविक 1999 में ट्रैकिंग और टूरिस्ट गाइड के तौर पर भारत आ गए थे। बाद में उन्होंने कुमाऊं और गढ़वाल में भी ट्रैकिंग की। सिंद्रे बताते हैं कि जब शुरुआत में उत्तराखंड आए तो उनको सबसे पहले हिंदी की जरूरत पड़ी। यहां के लोग अंग्रेजी कम जानते हैं। मजदूर, घोड़े वालों से बात करने के लिए हिंदी का ज्ञान जरूरी हो गया। वह बताते हैं कि हिंदी सीखने के लिए मसूरी में एक स्कूल में जाना शुरू किया। रोज सुबह-शाम चार-चार घंटे के अभ्यास के बाद वह थोड़ा बहुत हिंदी बोलना सीख गए। फिर ठीक-ठाक हिंदी बोलने में उनको डेढ़ वर्ष का समय लगा।
सिंद्रे बताते हैं कि हिंदी भाषा देवनागरी लिपि में है। इस लिपि को लिखने और पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं आती, इसकी तुलना में अंग्रेजी को लिखना तथा पढ़ना ज्यादा कठिन होता है। सिंद्रे 2007 से सपरिवार पिथौरागढ़ में रहते हैं। उनकी पत्नी इंगरिड, बेटी जेनी, जूलिया और एलिसा जब हिंदी बोलते हैं तो कोई भी यह आभास नहीं कर पाएगा कि वह विदेशी हैं। उनकी बेटियां स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेती हैं। हिंदी गीतों पर वह अच्छा नृत्य कर लेती हैं। सिंद्रे ने बताया कि उनको हिंदी भजन और कविताएं बेहद पसंद हैं। भजन और कविताओं की कई कैसेट उन्होंने अपने पास रखी हैं।
उन्होंने बताया कि हिंदी भाषा में काफी मिठास होती है। यदि कोई थोड़ा सा समय हिंदी को दे तो जल्दी ही उसे सीख जाता है। सिंद्रे ने बताया कि वह हिंदी साहित्य भी पढ़ना चाहते हैं। उनके घर पर हिंदी के अखबार नियमित आते हैं। इसे परिवार के सभी सदस्य पढ़ते हैं और फिर उनका संग्रह कर लेते हैं।
कुमाऊंनी भी सीख रहा सिंद्रे का परिवार
नार्वे के नागरिक सिंद्रे का परिवार अब कुमाऊंनी भी सीख रहा है। वह कहते हैं कि जिसे हिंदी आती है, उसे कुमाऊंनी सीखने में ज्यादा दिक्कत नहीं आती। बोलचाल में हिंदी और कुमाऊंनी के कई शब्द आपस में मिलते हैं। सिर्फ प्रवाह का अंतर रहता है। वह कहते हैं कि कुमाऊंनी बोली में भी काफी मिठास है। इसके लोकगीतों को सुनने में ही बड़ा आनंद आता है। वह कहते हैं कि अगले कुछ महीनों में वह थोड़ा बहुत कुमाऊंनी बोली भी सीख जाएंगे।