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दनौला धारे का पानी 60 फीसदी हो गया कम
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, थल (पिथौरागढ़)।
Updated Mon, 10 Apr 2017 11:30 PM IST
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ठुलीगाड़ पंपिंग योजना में कम होता जा रहा पानी
- फोटो : अमर उजाला
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थल (पिथौरागढ़)। यहां दनौला धारे का पानी अभी से 60 फीसदी तक कम हो गया है। दनौला और दाफिला गांव के सैकड़ों परिवारों की प्यास बुझाने वाले इस धारे की दो साल पूर्व मरम्मत की गई। मरम्मत के नाम पर स्रोत के आसपास सीमेंट पाट दिया गया। इससे स्रोत का पानी कम हो गया और प्राकृतिक रूप से बहने वाले पानी का प्रवाह भी बिखर गया। बताया गया है कि लोगों ने स्रोत के आसपास सीमेंट लगाने का लोगों ने विरोध भी किया था लेकिन विरोध को अनसुना कर दिया गया।
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दनौला धारे में पहले डेढ़ इंच मोटी पानी की धार आती थी। अब यह घटकर मात्र आधा इंच रह गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि धारे का पानी काफी शुद्ध है और इसमें मिनरल वाटर के जैसे गुण हैं। आज भी लोग गर्मियों में इसी स्रोत से पानी भरते हैं, लेकिन पानी की रफ्तार कम हो जाने से लोगों को काफी देर तक इंतजार करना पड़ता है। इस धारे के रखरखाव और संरक्षण के लिए गांव के लोगों ने अपने स्तर से तो कोई प्रयास नहीं किया लेकिन जब सरकारी पैसे से इसका नवीनीकरण हुआ तो पानी की मात्रा कम होने लगी। गर्मी के इस सीजन में लोग इस बात से परेशान हैं कि पता नहीं धारा कब सूख जाएगा। मई में धारे का पानी न्यूनतम स्तर पर पहुंच जाता है।
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थल। स्थानीय निवासी नीरू देवी का कहना है कि प्राकृतिक स्रोतों को बचाने के लिए सरकार ने कभी कोई योजना नहीं बनाई। अब सिर्फ दनौला धारा ही नहीं वरन गांवों में अन्य धारों तथा नौलों की दुर्दशा होने लगी है। वह कहती हैं कि स्रोतों को बचाने के लिए ठोस नीति बननी चाहिए। तभी इनका संरक्षण होगा।
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थल। स्थानीय निवासी सीता देवी का कहना है कि पानी के संकट की बात तो होती है लेकिन उसके संरक्षण की दिशा में कदम नहीं उठाया जाता। वह कहती हैं कि धारों के आसपास पेड़ लगाने की कोई योजना नहीं बन पाई। यदि स्रोत का पानी रिसने लगे तो उसे रोकने की तकनीक किसी को नहीं आती। स्रोतों से कई लोगों की प्यास बुझती है।