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राज्य गठन के बाद चुनाव में क्षेत्रवाद ज्यादा हावी हुआ
ब्यूरो/अमर उजाला, डीडीहाट
Updated Wed, 25 Jan 2017 10:42 PM IST
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बुजुर्ग वोटर देवसिंह डसीला
- फोटो : अमर उजाला
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92 वर्षीय देवसिंह डसीला को इस बात की पीड़ा है कि राज्य गठन के बाद जितने भी चुनाव हुए हैं, उनमें क्षेत्रवाद ही हावी हुआ है। प्रत्याशी की योग्यता के बजाए उसके क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा। अब चुनाव के समय विकास के मुद्दे गायब होते जा रहे हैं। सिर्फ प्रत्याशी की प्रशस्ति और तारीफ जनता के बीच की जा रही है। डसीला कहते हैं कि वैसे तो चुनाव के ट्रेंड में 1990 के बाद ही बदलाव आने लगा था। प्रचार के तरीके बदलने लगे, धन का बोलबाला बढ़ने लगा।
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पहले के चुनावों को याद करते हुए वह बताते हैं कि प्रचार में तब बेहद शांति रहती थी। प्रत्याशी कोशिश करता था कि हर घर तक पहुंचा जाए। समर्पित कार्यकर्ताओं की टोली बनती थी। कार्यकर्ता की निष्ठा पर किसी प्रकार का संदेह नहीं होता था। वह जिसके साथ है उसी का ईमानदारी से काम करता था। आज तो यह चिंता ज्यादा रहती है कि कार्यकर्ता खा यहां लेगा और वोट वहां दे देगा। मतदाताओं में भी चालाकी बढ़ी है। कुछ लोग चुनाव के अवसर का लाभ लेने की फिराक में रहते हैं। डसीला कहते हैं कि चुनाव में क्षणिक लाभ की अपेक्षा रखने वाले कई होते हैं। इनके मन में ऐसी भावना होती है कि वह किसी भी दल और प्रत्याशी के साथ मिल जाएंगे।
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वह कहते हैं कि चुनाव के तरीके बदल रहे हैं। आयोग की सख्ती के बावजूद कई प्रकार की कमियां सामने आ जाती हैं। डसीला कहते हैं कि चुनाव के समय अपने राज्य और देश की प्रगति की बातें पहले होनी चाहिए। व्यक्तिगत स्वार्थ की भावना को दूर रखा जाना चाहिए, लेकिन अब जिस तरह का माहौल खड़ा हो गया है, उसमें सुधार लाने में लंबा वक्त लगेगा।
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