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बस्तड़ी के अनाथ बच्चों के लिए रक्षाबंधन का कोई अर्थ नहीं

Wed, 17 Aug 2016 10:26 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, डीडीहाट
ब्यूरो/अमर उजाला, डीडीहाट Updated Wed, 17 Aug 2016 10:26 PM IST
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The orphans have no meaning for Bstdi Raksha Bandhan
बस्तड़ी हादसे में अनाथ अमन और पीयूष - फोटो : अमर उजाला

बस्तड़ी की आपदा में अनाथ हुए बच्चों के लिए रक्षाबंधन का कोई अर्थ नहीं रह गया है। इन बच्चों के चेहरे पर मायूसी और उदासी है। पिछले साल तक अमन और पीयूष राखी के पहले दिन बाजार जाकर सुंदर राखी खरीदकर लाते थे। चचेरी बहन उनको राखी पहनाती थी। माता-पिता घर पर त्योहार मनाते थे, लेकिन इस बार दोनों बच्चों की मां चंद्रकला भट्ट और पिता शेखर भट्ट की 30 जून की रात मलबे में दबकर मौत हो गई है। तब से यह दोनों बच्चे अपने दादा दामोदर भट्ट के साथ रहते हैं। नौ वर्षीय अमन कक्षा चार में और छह वर्षीय पीयूष कक्षा एक में पढ़ता है। दोनों बच्चों के चेहरे पर अजीब सी मायूसी है। 30 जून से वह माता-पिता की याद में बिलखते हैं। उनको पता हो चुका है कि अब माता-पिता कभी लौटकर नहीं आएंगे।

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ठीक इसी तरह की स्थिति मनोज और ममता की भी है। इन दोनों ने अपने माता-पिता इंदु भट्ट और जगदीश भट्ट को हादसे में खोया है। मनोज का कहना है कि जब परिवार ही बिखर गया तो किसी त्योहार का मतलब क्या रह जाता है। त्योहार तो परिवार के साथ ही मनाया जाता है। माता-पिता हर बार त्योहारों में और खासकर रक्षाबंधन पर विशेष आयोजन करते थे। घर में चहल-पहल रहती थी। पूजा-पाठ के बाद राखी बांधने का क्रम होता था। घर पर पकवान बनाए जाते थे, लेकिन अब वह दिन कभी लौटकर नहीं आएंगे।

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