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Pithoragarh News: पहाड़ के शूरवीरों ने दिया देश की रक्षा में बलिदान
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पिथौरागढ़ में शहीद सैनिकों की स्मृति में बना शहीद स्मारक। संवाद
- फोटो : PITHORAGARH
पिथौरागढ़। पिथौरागढ़ जिला शूरवीरों की धरती रहा है। यहां के शूरवीरों ने अपने वतन की ओर आंख उठाने वाले दुश्मनों का न सिर्फ सिर झुकाया बल्कि देश की आन, बान और शान की रक्षा के लिए जरूरत पड़ने पर अपने प्राण भी न्यौछावर कर दिए। 1971 के युद्ध में भी जिले के 87 जवानों ने शहादत दी थी।
आजादी की लड़ाई के अलावा 1948 के भारत-पाक युद्ध, 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1965 और 71 के भारत-पाक युद्ध में पिथौरागढ़ जिले के शूरवीरों ने पराक्रम दिखाकर दुश्मन को झुकने पर मजबूर कर दिया। 1971 में हुए भारत-पाक युद्ध में भी जिले के जवान अग्रिम पंक्ति पर रहे। इस युद्ध में जिले के एक मेजर सहित 87 जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी।
भारत-पाक युद्ध में इन जवानों ने दिया बलिदान
शहीद रतन सिंह, लाल सिंह, जीत सिंह, कैलाश राम, दुर्गादत्त, केशर सिंह, इंद्र सिंह, नारायण सिंह, किशन जोशी, मोहन सिंह, रतन मणि, जगत सिंह, हीरा चंद, राम सिंह, चंद्र मनी, धन सिंह, त्रिलोक सिंह, दलीप सिंह, भवानी राम, शेर सिंह, दीवानी नाथ, जगत सिंह, हीरा सिंह, पूरन सिंह, गोपाल दत्त सती, मान सिंह, श्याम चंद, दरबान सिंह, लछमन सिंह, शिव सिंह, रतन राम, महिमन सिंह, नेत्र सिंह, रतन सिंह, अंबा दत्त, जमन सिंह, दान सिंह, त्रिलोक सिंह, शेर सिंह, नारायण सिंह, टीका राम, ज्ञानी राम, भीम सिंह, जैन सिंह, प्रेमबल्लभ पंत, हरी चंद, प्रह्लाद सिंह, रेवाधर, गंगा सिंह, मान सिंह, प्रेम सिंह, केशव दत्त, शिवराज सिंह, प्रताप सिंह, केदार दत्त, ज्वाला दत्त, जोध सिंह, शेर सिंह, हरीश चंद्र, मदन सिंह, भवानी राम, नंदा बल्लभ, मेजर जीडी जोशी, जगत चंद, हीरा सिंह, मान सिंह, गोविंद सिंह, हीरा चंद, आन सिंह, हयात सिंह, गणेश चंद, गंभीर सिंह, कल्याण सिंह, मान सिंह, शेर सिंह, लक्ष्मण सिंह, नारायण सिंह, राम दत्त, ध्यान सिंह, गंभीर सिंह, किशन सिंह, गोपाल सिंह, हर सिंह, भोपाल सिंह, दरबान सिंह, खड़क सिंह, दीवान सिंह।
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चंपावत जिले के 13 जांबाजों ने दी थी शहादत
चंपावत। वर्ष 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में चंपावत जिले के जवानों का भी अहम योगदान रहा है। इस जंग में जिले के कुल 71 जांबाजों ने प्रतिभाग किया था जिसमें 13 जांबाजों ने शहादत दी थी तथा 58 सैनिकों ने बहादुरी से लड़ते हुए दुश्मन के दांत खट्टे किए। जंग में शामिल 41 जीवित जांबाजों के जेहन में आज भी युद्ध स्मृतियां तरोताजा हैं।
युद्ध में शामिल रहे लोहाघाट निवासी कैप्टन पीएस देव बताते हैं कि तब उनकी पलटन 6 कुमाऊं को पश्चिमी सेक्टर पर भेजा गया था। पाक की सीमा पर पहुंचकर आरसीएल में तैनाती मिली और दुश्मन का टैंक तोड़ने का आदेश मिला। पाक सैनिकों के बंकर में उनकी गन के गोले से सात पाकिस्तानी सैनिक हताहत हो गए। वहीं कैप्टन एनके पुनेठा ने भी युद्ध में अदम्य साहस दिखाया। नागा रेजीमेंट में रहते हुए उन्होंने कृष्णा नदी के किनारे धर्मादा में मोर्चा संभाला जहां से ढाका पहुंच पुनेठा ने अन्य साथियों के साथ 11 दिनों तक युद्ध में बहादुरी से मोर्चा संभाला। बाद में पाकिस्तानी सेना ने हथियार डाल दिए।
1971 के जंग में शहीद हुए चंपावत के 13 फौजी
चंपावत। 1971 की जंग में चंपावत जिले से शहादत देने वालों में कैप्टन उमेद सिंह माहरा, चामी चौमेल के सिपाही जोध सिंह, कलीगांव के सिपाही प्रताप सिंह, छंदा रेगडू के सिपाही शिवराज सिंह, कमैला के सिपाही केशव दत्त, ज्वाला दत्त, मल्लाकोट के नायक मान सिंह, मल्लाढेक के सिपाही ज्ञान सिंह, भाटीगांव के पायनियर रेवाधर, बुंगली के सिपाही हीरा चंद, रमैला के सिपाही हयात सिंह, सौंज के सिपाही केदार दत्त और मुडियानी के सिपाही प्रहलाद सिंह शामिल हैं। संवाद
पाकिस्तानियों ने जगह जगह बिछाई थी माइंस
लोहाघाट (चंपावत)। बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में प्रतिभाग कर चुके कैप्टन पीएस देव युद्ध के अनुभव साझा करते हुए बताते हैं कि वह युद्ध से ठीक पहले कमांडो कोर्स करने के उपरांत अवकाश पर घर आए थे। उसी समय उन्हें भी रीकॉल कर बुलाया गया, तत्काल वह अपनी यूनिट 6 कुमाऊं में पहुंचे तो पलटन की अधिकांश कंपनियां युद्धक्षेत्र के विभिन्न मोर्चो में जा चुकी थीं। उन्हें भी युद्ध में जाने का आदेश मिला। जब वह सांबा सेक्टर पहुंचे तो वहां की स्थिति अनुकूल नहीं थीं पाकिस्तानी सेना ने जगह-जगह कई स्थानों पर माइंस लगाई हुई थी लेकिन उन्होंने सुरक्षित मोर्चा संभालते हुए दुश्मन सेना के दांत खट्टे किए और 91 हजार पाकिस्तानी सैनिकों को आत्म समर्पण करना पड़ा। संवाद
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आजादी की लड़ाई के अलावा 1948 के भारत-पाक युद्ध, 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1965 और 71 के भारत-पाक युद्ध में पिथौरागढ़ जिले के शूरवीरों ने पराक्रम दिखाकर दुश्मन को झुकने पर मजबूर कर दिया। 1971 में हुए भारत-पाक युद्ध में भी जिले के जवान अग्रिम पंक्ति पर रहे। इस युद्ध में जिले के एक मेजर सहित 87 जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी।
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भारत-पाक युद्ध में इन जवानों ने दिया बलिदान
शहीद रतन सिंह, लाल सिंह, जीत सिंह, कैलाश राम, दुर्गादत्त, केशर सिंह, इंद्र सिंह, नारायण सिंह, किशन जोशी, मोहन सिंह, रतन मणि, जगत सिंह, हीरा चंद, राम सिंह, चंद्र मनी, धन सिंह, त्रिलोक सिंह, दलीप सिंह, भवानी राम, शेर सिंह, दीवानी नाथ, जगत सिंह, हीरा सिंह, पूरन सिंह, गोपाल दत्त सती, मान सिंह, श्याम चंद, दरबान सिंह, लछमन सिंह, शिव सिंह, रतन राम, महिमन सिंह, नेत्र सिंह, रतन सिंह, अंबा दत्त, जमन सिंह, दान सिंह, त्रिलोक सिंह, शेर सिंह, नारायण सिंह, टीका राम, ज्ञानी राम, भीम सिंह, जैन सिंह, प्रेमबल्लभ पंत, हरी चंद, प्रह्लाद सिंह, रेवाधर, गंगा सिंह, मान सिंह, प्रेम सिंह, केशव दत्त, शिवराज सिंह, प्रताप सिंह, केदार दत्त, ज्वाला दत्त, जोध सिंह, शेर सिंह, हरीश चंद्र, मदन सिंह, भवानी राम, नंदा बल्लभ, मेजर जीडी जोशी, जगत चंद, हीरा सिंह, मान सिंह, गोविंद सिंह, हीरा चंद, आन सिंह, हयात सिंह, गणेश चंद, गंभीर सिंह, कल्याण सिंह, मान सिंह, शेर सिंह, लक्ष्मण सिंह, नारायण सिंह, राम दत्त, ध्यान सिंह, गंभीर सिंह, किशन सिंह, गोपाल सिंह, हर सिंह, भोपाल सिंह, दरबान सिंह, खड़क सिंह, दीवान सिंह।
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चंपावत जिले के 13 जांबाजों ने दी थी शहादत
चंपावत। वर्ष 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में चंपावत जिले के जवानों का भी अहम योगदान रहा है। इस जंग में जिले के कुल 71 जांबाजों ने प्रतिभाग किया था जिसमें 13 जांबाजों ने शहादत दी थी तथा 58 सैनिकों ने बहादुरी से लड़ते हुए दुश्मन के दांत खट्टे किए। जंग में शामिल 41 जीवित जांबाजों के जेहन में आज भी युद्ध स्मृतियां तरोताजा हैं।
युद्ध में शामिल रहे लोहाघाट निवासी कैप्टन पीएस देव बताते हैं कि तब उनकी पलटन 6 कुमाऊं को पश्चिमी सेक्टर पर भेजा गया था। पाक की सीमा पर पहुंचकर आरसीएल में तैनाती मिली और दुश्मन का टैंक तोड़ने का आदेश मिला। पाक सैनिकों के बंकर में उनकी गन के गोले से सात पाकिस्तानी सैनिक हताहत हो गए। वहीं कैप्टन एनके पुनेठा ने भी युद्ध में अदम्य साहस दिखाया। नागा रेजीमेंट में रहते हुए उन्होंने कृष्णा नदी के किनारे धर्मादा में मोर्चा संभाला जहां से ढाका पहुंच पुनेठा ने अन्य साथियों के साथ 11 दिनों तक युद्ध में बहादुरी से मोर्चा संभाला। बाद में पाकिस्तानी सेना ने हथियार डाल दिए।
1971 के जंग में शहीद हुए चंपावत के 13 फौजी
चंपावत। 1971 की जंग में चंपावत जिले से शहादत देने वालों में कैप्टन उमेद सिंह माहरा, चामी चौमेल के सिपाही जोध सिंह, कलीगांव के सिपाही प्रताप सिंह, छंदा रेगडू के सिपाही शिवराज सिंह, कमैला के सिपाही केशव दत्त, ज्वाला दत्त, मल्लाकोट के नायक मान सिंह, मल्लाढेक के सिपाही ज्ञान सिंह, भाटीगांव के पायनियर रेवाधर, बुंगली के सिपाही हीरा चंद, रमैला के सिपाही हयात सिंह, सौंज के सिपाही केदार दत्त और मुडियानी के सिपाही प्रहलाद सिंह शामिल हैं। संवाद
पाकिस्तानियों ने जगह जगह बिछाई थी माइंस
लोहाघाट (चंपावत)। बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में प्रतिभाग कर चुके कैप्टन पीएस देव युद्ध के अनुभव साझा करते हुए बताते हैं कि वह युद्ध से ठीक पहले कमांडो कोर्स करने के उपरांत अवकाश पर घर आए थे। उसी समय उन्हें भी रीकॉल कर बुलाया गया, तत्काल वह अपनी यूनिट 6 कुमाऊं में पहुंचे तो पलटन की अधिकांश कंपनियां युद्धक्षेत्र के विभिन्न मोर्चो में जा चुकी थीं। उन्हें भी युद्ध में जाने का आदेश मिला। जब वह सांबा सेक्टर पहुंचे तो वहां की स्थिति अनुकूल नहीं थीं पाकिस्तानी सेना ने जगह-जगह कई स्थानों पर माइंस लगाई हुई थी लेकिन उन्होंने सुरक्षित मोर्चा संभालते हुए दुश्मन सेना के दांत खट्टे किए और 91 हजार पाकिस्तानी सैनिकों को आत्म समर्पण करना पड़ा। संवाद