{"_id":"58386cb94f1c1b663a13ba8c","slug":"the-effect-of-the-herb-producers-notbandi","type":"story","status":"publish","title_hn":"नोटबंदी का असर जड़ी-बूटी उत्पादकों पर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
नोटबंदी का असर जड़ी-बूटी उत्पादकों पर
कृष्णा गर्ब्याल/अमर उजाला, धारचूला
Updated Fri, 25 Nov 2016 10:24 PM IST
विज्ञापन
जौलजीबी मेले में लगी जड़ी बूटी की एक दुकान
- फोटो : अमर उजाला
नोेटबंदी का व्यापक असर इस बार जड़ी-बूटी उद्यमियों पर भी पड़ा है। जौलजीबी मेले में जहां पिछले सालों तक जड़ी-बूटियों की अच्छी बिक्री होती थी, इस बार नोटबंदी के चलते यह बिक्री 60 फीसदी तक गिर गई है। सीमांत के दारमा, व्यास के ऊंचाई वाले इलाकों पर बेहद कीमती एवं जीवन रक्षक औषधीय गुणों से परिपूर्ण जड़ी-बूटी प्रचुर मात्रा में मिलती है। इन जड़ी-बूटियों का आज भी बड़ी संख्या में लोग उपयोग करते हैं। किसान आज भी 18 हजार फीट की ऊंचाई से आगे जाकर इन जड़ी-बूटियों का संग्रह करते हैं और जौलजीबी मेले में इनको बेचकर अपने खर्चे की व्यवस्था करते हैं।
विज्ञापन
दारमा क्षेत्र के निवासी एवं ‘ह्या पुम्से स्वयं सहायता समूह के संचालक जड़ी-बूटी किसान ज्ञान सिंह दरियाल लगातार कई वर्षों से जौलजीबी मेले में आ रहे हैं तथा हर वर्ष जड़ी-बूटी बेचकर स्वयं सहायता समूह से जुड़े परिवारों का आजीविका चलाते हैं। उनका कहना है कि इस बार भी बड़े उत्साह से जम्बू, गंदरायणी, डोलू, जंगली लहसुन, कुटकी, सिलफोरा, बालजडी, सालमपंजा, गोकुल धूप, पद्म धूप, जटामांसी, भूतकेसरी सहित 18 जड़ी-बूटियों के साथ जौलजीबी मेले में आए, मगर पूरे मेले के सीजन में सुनसानी छाई रही।
विज्ञापन
उन्होंने कहा कि जहां और साल 1.5 से 2 लाख रुपए तक की जड़ी-बूटी बिक जाती थी, वहीं इस बार जड़ी-बूटी की बिक्री में भारी गिरावट आई है। इस वर्ष अब तक 40 हजार की जड़ी-बूटी ही बिक पाई है। इधर, जौलजीबी के व्यापारियों ने 500 और 1000 के नोट लेने का फैसला तो लिया था, लेकिन अब एकमुश्त इस राशि को खाते में डालने से भी डर रहे हैं। जौलजीबी मेले में अब सांस्कृतिक कार्यक्रम संपन्न हो गए हैं। सरकारी विभागों ने अपने स्टाल हटा दिए हैं, लेकिन दुकानें 30 नवंबर तक लगी रहेंगी।
विज्ञापन