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तापमान तो गिरा पर बारिश की उम्मीद नहीं
ब्यूरो/अमर उजाला,पिथौरागढ़
Updated Fri, 15 Jan 2016 10:15 PM IST
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मौसम की ताजा स्थितियों से मौसम विज्ञानी भी हैरान हैं। पिछले वर्ष की तुलना में यदि 15 जनवरी के तापमान को देखा जाए तो यह काफी कम रहा है। पिछले साल यानि कि जनवरी 2015 में शुक्रवार के दिन अधिकतम तापमान 18.9 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम तापमान 4.6 डिग्री सेल्सियस था। जबकि आज यानि कि 15 जनवरी 2016 को अधिकतम तापमान 15.2 डिग्री और न्यूनतम तापमान 3.5 डिग्री सेल्सियस रिकार्ड किया गया। जाहिर सी बात है कि पिछले वर्ष की तुलना में इस बार ठंड अधिक है।
मौसम विज्ञानियों का कहना है कि पश्चिमी विक्षोभ बीच बीच में सक्रिय तो हो रहा है लेकिन उत्तराखंड में उसका इंपैक्ट कम नजर आएगा। जम्मू-कश्मीर और अधिक से अधिक हिमाचल प्रदेश तक आने के बाद सिस्टम कमजोर पड़ रहा है। पिछले दिनों भी इसी तरह हल्के स्तर के बादल दिखाई दिए और उसका असर बेहद मामूली रहा। मौसम विज्ञान विभाग के उपमहानिदेशक डा. आनंद शर्मा ने बताया कि फिलहाल किसी मजबूत सिस्टम के सक्रिय होने के चांस बहुत कम हैं। यदि दो तीन दिन में कोई सिस्टम सक्रिय होता है तो उसका असर उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ही दिखाई देगा। निचले इलाकों में लोगों को बारिश तथा बर्फबारी देखने को नहीं मिल पाएगी।
फसलों पर अब पहुंचने लगा नुकसान
पिथौरागढ़। जिले में गेहूं और मसूर की फसल इस बार चौपट होने की स्थिति में आ गई है। कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों के अनुसार अब यदि बारिश होती भी है तो उसका फसलों को कोई लाभ नहीं मिलेगा। कृषि वैज्ञानिक डा. आरके सिंह ने कहा कि पहाड़ में अधिकांश जमीन बारिश के पानी पर निर्भर रहती है। यदि नवंबर या दिसंबर में बारिश हो जाती तो शायद फसलों को कम नुकसान पहुंचता।
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पेयजल की हो जाएगी गंभीर किल्लत
मानसून सीजन में इस बार औसत से 30 फीसदी कम बारिश हुई थी। इस कारण प्राकृतिक स्रोत सही ढंग से रिचार्ज नहीं हो पाए थे। अब तक शीतकालीन वर्षा न होने से इस बार सभी इलाकों में पेयजल का संकट गहरा सकता है। ग्रामीण अंचलों में अभी से प्राकृतिक स्रोतों का स्तर कम हो गया है। जिला मुख्यालय में दिसंबर अंत से ही पेयजल को लेकर त्राहि त्राहि मचने लगी है।
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मौसम विज्ञानियों का कहना है कि पश्चिमी विक्षोभ बीच बीच में सक्रिय तो हो रहा है लेकिन उत्तराखंड में उसका इंपैक्ट कम नजर आएगा। जम्मू-कश्मीर और अधिक से अधिक हिमाचल प्रदेश तक आने के बाद सिस्टम कमजोर पड़ रहा है। पिछले दिनों भी इसी तरह हल्के स्तर के बादल दिखाई दिए और उसका असर बेहद मामूली रहा। मौसम विज्ञान विभाग के उपमहानिदेशक डा. आनंद शर्मा ने बताया कि फिलहाल किसी मजबूत सिस्टम के सक्रिय होने के चांस बहुत कम हैं। यदि दो तीन दिन में कोई सिस्टम सक्रिय होता है तो उसका असर उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ही दिखाई देगा। निचले इलाकों में लोगों को बारिश तथा बर्फबारी देखने को नहीं मिल पाएगी।
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फसलों पर अब पहुंचने लगा नुकसान
पिथौरागढ़। जिले में गेहूं और मसूर की फसल इस बार चौपट होने की स्थिति में आ गई है। कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों के अनुसार अब यदि बारिश होती भी है तो उसका फसलों को कोई लाभ नहीं मिलेगा। कृषि वैज्ञानिक डा. आरके सिंह ने कहा कि पहाड़ में अधिकांश जमीन बारिश के पानी पर निर्भर रहती है। यदि नवंबर या दिसंबर में बारिश हो जाती तो शायद फसलों को कम नुकसान पहुंचता।
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पेयजल की हो जाएगी गंभीर किल्लत
मानसून सीजन में इस बार औसत से 30 फीसदी कम बारिश हुई थी। इस कारण प्राकृतिक स्रोत सही ढंग से रिचार्ज नहीं हो पाए थे। अब तक शीतकालीन वर्षा न होने से इस बार सभी इलाकों में पेयजल का संकट गहरा सकता है। ग्रामीण अंचलों में अभी से प्राकृतिक स्रोतों का स्तर कम हो गया है। जिला मुख्यालय में दिसंबर अंत से ही पेयजल को लेकर त्राहि त्राहि मचने लगी है।