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जून के महीने एक दशक बाद 10 हजार फीट पर नजर आई स्नो लाइन
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बर्फ से लकदक पिथौरागढ़ की छिपला पहाड़ी।
- फोटो : PITHORAGARH
भक्त दर्शन पांडेय
पिथौरागढ़। मौसम में आ रहे बदलाव के बीच इस बार जून में स्नो लाइन 10 से साढ़े दस हजार फुट की ऊंचाई पर नजर आ रही है, जबकि पिछले सालों में स्नो लाइन मई में ही 14 हजार फुट की ऊंचाई तक सिकुड़ जाती थी। अध्ययनकर्ताओं के अनुसार लगभग एक दशक बाद हिमालयी क्षेत्र में स्नो लाइन इतनी नीचे आई है।
पिछले डेढ़ से दो दशकों में मौसम में काफी बदलाव आए हैं। कभी लंबे समय तक सूखा पड़ रहा है तो कभी अतिवृष्टि हो रही है। पिछले वर्षों में शीतकाल में बारिश और पर्याप्त बर्फबारी तक नहीं हुई। छह सालों का रिकॉर्ड देखें तो वर्ष 2014-15 से 2019 तक सर्दियों में बारिश नहीं होने से फसलें का उत्पादन भी प्रभावित हुआ था। कम बारिश और कम हिमपात से मार्च में ही ग्लेशियरों की बर्फ पिघलने के कारण हिमालय की पहाड़ियां काली नजर आ रहीं थी। मई आते-आते स्नो लाइन 14 हजार फीट से भी ऊपर चली जाती थी। लगभग एक दशक के बाद इस बार जून में 10 से साढ़े दस हजार फुट पर स्नो लाइन दिख रही है।
जाड़ों में अच्छी बारिश और हिमपात के बाद अब भी निचले इलाकों में बारिश होने पर उच्च हिमालयी क्षेत्र में हिमपात हो जाता है। ऐसे में छिपला सहित अन्य चोटियां बर्फ से लकदक नजर आ रहीं हैं।
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हिमालयी क्षेत्र के अध्ययनकर्ताओं के अनुसार ऐसा लगभग एक दशक के अंतराल में दिख रहा है। पर्यावरणविद् इसे अच्छा संकेत बताते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार अधिक हिमपात से हिमालयी नदियों का जल स्तर अच्छा रहेगा। रिचार्ज बढ़ने से भूमिगत जल स्तर में भी बढ़ोतरी होगी।
............
पिछले दो दशकों में मौसम में बड़ा परिवर्तन दिखाई दिया है। कहीं सूखा, कहीं अतिवृष्टि तो कहीं बाढ़ की घटनाएं हो रहीं हैं। पिछले दस सालों में ऐसा भी हुआ है जब सात से आठ माह तक बारिश नहीं हुई है। इस बार शीतकाल में लगातार बारिश हुई है। हिमालयी क्षेत्र में पर्याप्त बर्फबारी हुई है। काफी नीचे तक स्नो लाइन मौजूद है। इससे ग्रीष्मकाल में हिमालयी नदियों का फ्लो अच्छा रहेगा। नमी से भूमिगत जल का स्तर भी बढ़ेगा। -डॉ.शेखर पाठक, इतिहासकार, पर्यावरणविद् और हिमालयी क्षेत्र के अध्ययनकर्ता।
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पिथौरागढ़। मौसम में आ रहे बदलाव के बीच इस बार जून में स्नो लाइन 10 से साढ़े दस हजार फुट की ऊंचाई पर नजर आ रही है, जबकि पिछले सालों में स्नो लाइन मई में ही 14 हजार फुट की ऊंचाई तक सिकुड़ जाती थी। अध्ययनकर्ताओं के अनुसार लगभग एक दशक बाद हिमालयी क्षेत्र में स्नो लाइन इतनी नीचे आई है।
पिछले डेढ़ से दो दशकों में मौसम में काफी बदलाव आए हैं। कभी लंबे समय तक सूखा पड़ रहा है तो कभी अतिवृष्टि हो रही है। पिछले वर्षों में शीतकाल में बारिश और पर्याप्त बर्फबारी तक नहीं हुई। छह सालों का रिकॉर्ड देखें तो वर्ष 2014-15 से 2019 तक सर्दियों में बारिश नहीं होने से फसलें का उत्पादन भी प्रभावित हुआ था। कम बारिश और कम हिमपात से मार्च में ही ग्लेशियरों की बर्फ पिघलने के कारण हिमालय की पहाड़ियां काली नजर आ रहीं थी। मई आते-आते स्नो लाइन 14 हजार फीट से भी ऊपर चली जाती थी। लगभग एक दशक के बाद इस बार जून में 10 से साढ़े दस हजार फुट पर स्नो लाइन दिख रही है।
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जाड़ों में अच्छी बारिश और हिमपात के बाद अब भी निचले इलाकों में बारिश होने पर उच्च हिमालयी क्षेत्र में हिमपात हो जाता है। ऐसे में छिपला सहित अन्य चोटियां बर्फ से लकदक नजर आ रहीं हैं।
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हिमालयी क्षेत्र के अध्ययनकर्ताओं के अनुसार ऐसा लगभग एक दशक के अंतराल में दिख रहा है। पर्यावरणविद् इसे अच्छा संकेत बताते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार अधिक हिमपात से हिमालयी नदियों का जल स्तर अच्छा रहेगा। रिचार्ज बढ़ने से भूमिगत जल स्तर में भी बढ़ोतरी होगी।
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पिछले दो दशकों में मौसम में बड़ा परिवर्तन दिखाई दिया है। कहीं सूखा, कहीं अतिवृष्टि तो कहीं बाढ़ की घटनाएं हो रहीं हैं। पिछले दस सालों में ऐसा भी हुआ है जब सात से आठ माह तक बारिश नहीं हुई है। इस बार शीतकाल में लगातार बारिश हुई है। हिमालयी क्षेत्र में पर्याप्त बर्फबारी हुई है। काफी नीचे तक स्नो लाइन मौजूद है। इससे ग्रीष्मकाल में हिमालयी नदियों का फ्लो अच्छा रहेगा। नमी से भूमिगत जल का स्तर भी बढ़ेगा। -डॉ.शेखर पाठक, इतिहासकार, पर्यावरणविद् और हिमालयी क्षेत्र के अध्ययनकर्ता।