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Hindi News ›   Uttarakhand ›   Pithoragarh News ›   Reverberate in the lyrics to the tune of Bstdi Hudkia

बस्तड़ी में अब नहीं गूंजेगी हुड़किया बोल की धुन

Wed, 20 Jul 2016 10:28 PM IST
संजू पंत/अमर उजाला, बस्तड़ी/डीडीहाट
संजू पंत/अमर उजाला, बस्तड़ी/डीडीहाट Updated Wed, 20 Jul 2016 10:28 PM IST
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Reverberate in the lyrics to the tune of Bstdi Hudkia
बस्तड़ी में उजड़े खेतों को देखती महिला - फोटो : अमर उजाला

बस्तड़ी के खेतों में अब न तो कभी रोपाई लगेगी और न ही हुड़किया बोल रोपाई के दिन सामूहिक रूप से गाया जाने वाला-घुण घुण कच्यार है रौ, हौल बल्द छाजी रै, रोपाई को जोर हैरौछ, हुड़का बाजी रै (घुटने घुटने तक कीचड़ हो रहा है, बैलों की जोड़ी सजी है, रोपाई का जोर मचा है, हुड़का बज रहा है) गीत अब सुनाई देगा। वजह, बस्तड़ी गांव में मल्लागांव और माखन में दो हिस्सों में बंटी 320 नाली जमीन पर मलबा पटा है। घरों के आगे लोग करीब 20 नाली जमीन में सब्जी उगाया करते थे। इस सीजन में अब तक खेतों में ककड़ी, लौकी, कद्दू, बैंगन, भिंडी, शिमला मिर्च की खुशबू बिखर जाती थी। गांव के लोग 60 नाली जमीन पर रोपाई लगाते थे। वर्ष 2000 तक श्रम को सामूहिकता प्रदान करने के लिए रोपाई के दिन हुड़किया बोल लगाया जाता था।

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लेकिन, 30 जून की रात की आपदा ने बस्तड़ी गांव के लोगों की अर्थव्यवस्था पर भी गंभीर चोट की है। खेत अब बुआई करने लायक नहीं रह गए हैं। इन सीढ़ीदार खेतों का आकार ही समाप्त हो गया है। गांव के शंकर दत्त भट्ट कहते हैं कि लोग खेतों में धान, मडु़वा, उड़द, मसूर, जौ का इतना उत्पादन कर लेते थे कि बाजार पर निर्भरता बहुत कम रहती थी। बस्तड़ी की सब्जी ओगला, डीडीहाट, अस्कोट, नारायणनगर, मिर्थी बाजार में बिकने जाती तो वह हाथों हाथ बिक जाती।
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बस्तड़ी की मिट्टी में पैदा होने वाली हर सब्जी का स्वाद अद्भुत होता था। इस बार न तो इन सब्जियों का उत्पादन हुआ और न वह बाजार में बिकने के लिए ही पहुंची। गांव के लोग जब उजड़े खेतों को देखते हैं तो उनकी आंखों में आंसू छलक आते हैं। आपदा ने लोगों का जीवन, मकान और जमीन सब कुछ छीन लिया। गांव की रंजना भट्ट कहती हैं कि जिन पहाड़ों में इस सीजन में हरी और कोमल घास होती थी वहां पर मलबा है। अधिकांश जानवर मलबे में दब गए हैं। गांव के लोग पहले घी, दूध बेचकर भी कमाई कर लेते थे, अब वह भी समाप्त हो गया है।
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मल्लागांव से आने वाला नाला फिर मचाएगा तबाही
बस्तड़ी निवासी नीरज भट्ट और उड़मा निवासी धीरज खड़ायत का कहना है कि बस्तड़ी गांव के पास की पहाड़ी पर मल्लागांव के पास से निकलने वाला नाला फिर तबाही मचा सकता है। इसी नाले का रुख पलटने से 30 जून की रात तबाही मची थी। वह कहते हैं कि इस नाले में सुरक्षा दीवार और चेकडैम बनाए जाने जरूरी हैं। यह नाला उफना तो उड़मा गांव में फिर तबाही मचेगी।

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