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23 साल बाद भी नहीं हुआ मैग्नेसाइट फैक्ट्री के 350 कर्मियों के बकाए का भुगतान
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पिथौरागढ़ मैग्नेटसाइट फैक्ट्री।
- फोटो : PITHORAGARH
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पिथौरागढ़। चंडाक की मैग्नेसाइट फैक्ट्री के श्रमिक और कर्मचारी 23 साल बीतने के बाद भी बकाए के भुगतान की उम्मीद में संघर्ष कर रहे हैं। वर्ष 1998 में यह फैक्ट्री बंद होने से 350 स्थायी कर्मचारी और श्रमिक बेरोजगार हो गए थे।
उड़ीसा निवासी उद्योगपति जेके झुनझुनवाला ने वर्ष 1974 में चंडाक में मैग्नीशियम कार्बोनेट (मैग्नेसाइट) का खदान शुरू किया था। बेहतर गुणवत्ता के कारण यहां से कच्चा माल निकालकर ओडिशा भेजा जाने लगा। स्थानीय लोगों के विरोध के बाद 1980 में चंडाक में डीबीएम प्लांट लगाया गया। वर्ष 1996 तक फैक्ट्री ठीक चली।
इसके बाद अचानक प्लांट में उत्पादन गिरने के कारण कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला। फैक्ट्री स्वामी ने कर्मचारियों और श्रमिकों को वेतन, ग्रेच्युटी, बोनस और ईपीएफ का भुगतान किए बिना ही 1998 में फैक्ट्री बंद कर दी। चार मार्च 1999 को 350 कर्मचारियों, श्रमिकों को बर्खास्त कर दिया गया। इससे कई कर्मचारियों को खाने के लाले पड़ गए।
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इसलिए कई कर्मियों और श्रमिकों ने दूसरे व्यवसाय या नौकरी शुरू की। देयकों का भुगतान करने की मांग के लिए कई कर्मचारी और श्रमिक 12 साल तक संघर्ष करते रहे। यह विवाद सुलझाने के लिए प्रादेशिक औद्योगिक निवेश निगम ने वर्ष 2001 में एक समिति गठित की।
इस फैक्ट्री के परिसमापन के लिए औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड (बीआईएफआर) ने मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजा। इसके बाद भी कोई कार्रवाई न होने पर कर्मचारियों ने वर्ष 2009 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वाद दायर किया था। कर्मचारी और श्रमिक इस वाद के फैसले का इंतजार कर रहे हैं।
मैग्नेसाइट फैक्ट्री में अधिकारी रहे सीएम अवस्थी ने राज्यसभा सदस्य अनिल बलूनी को पत्र भेजा। बताया कि फैक्ट्री प्रबंधन को करीब 16 करोड़ का भुगतान करना है। उन्होंने प्लांट में बचे लोहे की नीलामी की मांग की है ताकि श्रमिकों और कर्मचारियों का भुगतान हो सके।
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उड़ीसा निवासी उद्योगपति जेके झुनझुनवाला ने वर्ष 1974 में चंडाक में मैग्नीशियम कार्बोनेट (मैग्नेसाइट) का खदान शुरू किया था। बेहतर गुणवत्ता के कारण यहां से कच्चा माल निकालकर ओडिशा भेजा जाने लगा। स्थानीय लोगों के विरोध के बाद 1980 में चंडाक में डीबीएम प्लांट लगाया गया। वर्ष 1996 तक फैक्ट्री ठीक चली।
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इसके बाद अचानक प्लांट में उत्पादन गिरने के कारण कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला। फैक्ट्री स्वामी ने कर्मचारियों और श्रमिकों को वेतन, ग्रेच्युटी, बोनस और ईपीएफ का भुगतान किए बिना ही 1998 में फैक्ट्री बंद कर दी। चार मार्च 1999 को 350 कर्मचारियों, श्रमिकों को बर्खास्त कर दिया गया। इससे कई कर्मचारियों को खाने के लाले पड़ गए।
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इसलिए कई कर्मियों और श्रमिकों ने दूसरे व्यवसाय या नौकरी शुरू की। देयकों का भुगतान करने की मांग के लिए कई कर्मचारी और श्रमिक 12 साल तक संघर्ष करते रहे। यह विवाद सुलझाने के लिए प्रादेशिक औद्योगिक निवेश निगम ने वर्ष 2001 में एक समिति गठित की।
इस फैक्ट्री के परिसमापन के लिए औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड (बीआईएफआर) ने मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजा। इसके बाद भी कोई कार्रवाई न होने पर कर्मचारियों ने वर्ष 2009 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वाद दायर किया था। कर्मचारी और श्रमिक इस वाद के फैसले का इंतजार कर रहे हैं।
मैग्नेसाइट फैक्ट्री में अधिकारी रहे सीएम अवस्थी ने राज्यसभा सदस्य अनिल बलूनी को पत्र भेजा। बताया कि फैक्ट्री प्रबंधन को करीब 16 करोड़ का भुगतान करना है। उन्होंने प्लांट में बचे लोहे की नीलामी की मांग की है ताकि श्रमिकों और कर्मचारियों का भुगतान हो सके।