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लंदन फोर्ट बना सैलानियों के आकर्षण का केंद्र

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Sun, 17 Apr 2022 11:48 PM IST
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London Fort in Pithauragarh
पिथौरागढ़ का ऐतिहासिक लंदन फोर्ट। संवाद - फोटो : PITHORAGARH
पिथौरागढ़। नगर के बीचोंबीच स्थित लंदन फोर्ट (बाउलीकीगढ़) सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बना है। गोरखा राजाओं ने 18वीं सदी में इस किले का निर्माण किया गया था। लगभग 135 वर्षों तक इसमें तहसील का कामकाज संचालित होने से यह ऐतिहासिक धरोहर पर्यटकों और आम लोगों की नजरों से दूर रही।
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इतिहास के अनुसार बाउलीकीगढ़ नामक इस किले का निर्माण 1791 में गोरखा शासकों ने किया था। इस किले के चारों ओर स्थित सुरक्षा दीवार में 152 छिद्र बने हैं। बताया जाता है कि यह छिद्र किले पर आक्रमण करने वाले दुश्मनों पर नजर रखने और आक्रमण की स्थिति में उन्हें बंदूकों से मार गिराने के लिए बनाया गया था।
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किले की लंबाई 88.5 मीटर और चौड़ाई 40 मीटर है। 8.9 फुट ऊंचाई वाली इस दीवार की चौड़ाई पांच फुट चार इंच है। पत्थरों से बने इस किले के निर्माण में गारे का प्रयोग किया गया था। बताया जाता है कि प्रवेश द्वार के अलावा इस किले में पहले एक गोपनीय दरवाजा भी था जो अब नहीं दिखता है। कहा जाता है कि इस किले में गोरखा सैनिक और सामंत ठहरते थे। इस किले में एक तहखाना भी बनाया गया था। इसमें कीमती सामना और असलहे रखे जाते थे। किले में बंदी गृह और न्याय भवन भी था। किले के अंदर कुछ गुप्त दरवाजे और रास्ते भी थे, जिनका उपयोग संकट के समय में किया जाता था। कहा जाता है कि किले के भीतर एक कुआं भी था। एक व्यक्ति के इसमें डूबकर मरने के बाद इसको बंद कर दिया गया और उस पर पीपल का एक पेड़ लगा दिया गया।
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सिगौली की संधि के बाद वर्ष 1815 में कुमाऊं में औपनिवेशिक शासन स्थापित हुआ तो अंग्रेजों ने इस किले का नाम बाउलीकीगढ़ से बदलकर लंदन फोर्ट कर दिया। सन 1881 में इस किले में तहसील का कामकाज शुरू हुआ। वर्ष 1910-20 के बीच में अंग्रेजों ने किले की मरम्मत कराई। लंदन फोर्ट में लगे एक शिलापट्ट में प्रथम विश्व युद्ध में प्राणों की आहुति देने वाले सैनिकों का उल्लेख किया गया है। शिलापट में लिखा गया है कि परगना सोर एंड जोहार से विश्व युद्ध में 1005 सैनिक शामिल हुए थे, जिनमें से 32 सैनिकों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

आजादी के बाद भी इस किले में तहसील संचालित होती रही। वर्ष 2015 में लगभग 4.65 करोड़ रुपये की लागत से किले का सौंदर्यीकरण शुरू किया गया। वर्ष 2018 में इसे कुमाऊं मंडल विकास निगम को हस्तांतरित किया गया। अब इसका संचालन केएमवीएन कर रहा है। किले में निगम ने प्रवेश शुल्क भी रखा है और सैलानियों के लिए रेस्टोरेंट भी बनाया गया है। इस किले में रोजाना बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों के साथ ही सैलानी भी आते हैं। किले के सौंदर्यीकरण के समय संग्रहालय बनाने की बात भी कही गई थी लेकिन इसके लिए कोई कार्यवाही नहीं हुई है।
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