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आज तिब्बत में प्रवेश करेगा प्रथम कैलास यात्री दल

Sun, 19 Jun 2016 10:17 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, डीडीहाट
ब्यूरो/अमर उजाला, डीडीहाट Updated Sun, 19 Jun 2016 10:17 PM IST
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Kailash in Tibet today will enter the first expedition
कैलास यात्री - फोटो : अमर उजाला

कैलास मानसरोवर की यात्रा पर जा रहे प्रथम दल के 55 सदस्य सोमवार तड़के चार बजे से पहले लिपुलेख दर्रा पार कर तिब्बत में प्रवेश करेंगे। लिपुलेख दर्रे में सुबह छह बजे से तेज हवाएं चलने लगती हैं। इसलिए यात्रियों को उससे पहले ही दर्रा पार कराना पड़ता है। रविवार को प्रथम दल के सदस्य गुंजी से चलकर नाभीढांग पड़ाव पहुंचे। नाभीढांग यात्रा मार्ग का अंतिम पड़ाव है। गुंजी एवं आसपास के इलाकों में बारिश होने से कालापानी, नाभीढांग में तापमान में भारी गिरावट आ गई है। लिपुलेख दर्रे में अभी हल्की बर्फ मौजूद है।

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आईटीबीपी सातवीं वाहिनी के नियंत्रण कक्ष से मिली जानकारी के अनुसार प्रथम दल के सभी यात्री स्वस्थ हैं। आईटीबीपी के सेनानी महेंद्र प्रताप ने बताया कि गुंजी से लिपुलेख तक हर स्थान पर आईटीबीपी के जवान तैनात किए गए हैं। आईटीबीपी की मेडिकल टीम भी लिपुलेख दर्रे तक यात्रियों के साथ रहेगी। उन्होंने बताया सोमवार सुबह यात्री तिब्बत में प्रवेश करेंगे। आगे की व्यवस्था तिब्बत के अधिकारी देखेंगे।
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इस बीच 48 यात्रियों का दूसरा दल रविवार सुबह सिर्खा से चलकर गाला पड़ाव पहुंच गया है। सभी यात्री सुरक्षित और स्वस्थ हैं। सोमवार को यह दल बूंदी पड़ाव में रुकेगा। यात्रियों की व्यवस्था देखने के लिए एसडीआरएफ, पुलिस के जवान भी तैनात किए गए हैं। जिलाधिकारी एचसी सेमवाल ने सभी विभागों को निर्देश दिए हैं कि यात्रियों के लिए किसी प्रकार की कमी नहीं होनी चाहिए। 
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वाहनों से यात्री भेजने की व्यवस्था नहीं
इस बार की यात्रा के दौरान यात्रियों को गुंजी से कालापानी तक वाहनों से ले जाने के लिए पहले कुमाऊं मंडल विकास निगम ने जोर-शोर से प्रचार किया था, लेकिन केएमवीएन गुंजी में अपने वाहन नहीं पहुंचा पाया है। गुंजी से धारचूला तक अभी सड़क नहीं बनी है। अलबत्ता गुंजी से कालापानी के बीच आठ किलोमीटर सड़क का निर्माण हो चुका है। गुंजी में वाहन पहुंचाना बिना हेलीकॉप्टर के संभव नहीं है। निगम के अधिकारियों का कहना है कि यह काम काफी खर्चीला होने के कारण वाहन भेजने की व्यवस्था नहीं की गई। प्रथम दल के यात्रियों को गुंजी से आगे का सफर पहले की तरह पैदल ही करना पड़ा।

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