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विलुप्ति की कगार पर पेट के कीड़ों का दुश्मन जामिर
केबी पाल/अमर उजाला, अस्कोट
Updated Wed, 14 Dec 2016 10:53 PM IST
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अस्कोट में जामिर के फलों से लदा पेड़
- फोटो : अमर उजाला
पेट के कीड़ों का दुश्मन एवं विटामिन-सी से भरपूर नीबू प्रजाति का जामिर विलुप्ति की कगार पर पहुंच गया है। संरक्षण का अभाव जामिर के अस्तित्व के लिए खतरा बन गया है।
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पेट के कीड़ों के लिए रामबाण माने जाने वाले जामिर का बाटनिकल नाम साइट्रस जामधीरी और वैज्ञानिक नाम साइट्रस आशा मेनसिस है। विटामिन-सी से भरपूर जामिर का अपने पहाड़ पर सदियों से दवा के रूप में उपयोग होता रहा है। जामिर के रस को पकाकर उससे तैयार काढ़े का चटनी में प्रयोग किया जाता है। काढ़ा लंबे समय तक सुरक्षित रहता है। जामिर के काढ़े की दो-चार बूंदे पेट के कीड़ों को मारने में सक्षम हैं। पहले कूटा, जमतड़ी, अस्कोट, बगड़ीहाट में जामिर बहुतायत में होता था। अब इलाके में जामिर के 8-10 ही पेड़ रह गए हैं।
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95 वर्षीय बुजुर्ग लक्ष्मण पाल कहते हैं कि पहले पहाड़ पर जामिर बहुत ज्यादा होता था। सर्दियों में नमक, चीनी, शहद डालकर लोग जामिर खाते थे। पहले अस्पताल नहीं हुआ करते थे तो उस समय पेट के कीड़ों को मारने के लिए जामिर का ही सहारा था। आजकल की पीढ़ी इसका उपयोग नहीं जानती है। कहते हैं जामिर को संरक्षित करने की जरूरत है। अस्कोट के उद्यान सचल दल प्रभारी गौरव जोशी कहते हैं कि नीबू और बड़ा नीबू (चूख) के पौधे उपलब्ध हैं, लेकिन जामिर के पौधे उपलब्ध नहीं हैं।
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जामिर पेट के कीड़े मारने में कारगर है। यह मानव और जानवरों पर एक सा असर करता है। इसका कास्मेटिक इंडस्ट्रीज में भी उपयोग होता है। पकाया रस सालों तक काम आता है। जामिर के पौध विकसित करने के प्रयास किए जाएंगे। -डा. मीनाक्षी जोशी, जिला उद्यान अधिकारी, पिथौरागढ़