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सिमट गया परंपरागत दन, चुटका और थुलमा का कारोबार
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मुनस्यारी के दुम्मर गांव में ऊन से थुलमा बनाती कमला देवी।
- फोटो : PITHORAGARH
मुनस्यारी (पिथौरागढ़)। जिले के मुनस्यारी, धारचूला में बनने वाले दन, चुटका, थुलमा और परंपरागत ऊनी कपड़ों का बाजार सिमट गया है। कभी देशभर में जिन ऊनी कपड़ों की भारी मांग रहती थी, अब बाजार में उनके स्थान पर मशीनों से निर्मित सिंथेटिक और हल्के कपड़े बिक रहे हैं। बाजार में मांग घटने से ऊन उद्योग से जुड़े लोगों ने अब दूसरे व्यवसाय अपना लिए हैं।
सीमांत मुनस्यारी-धारचूला का ऊन कारोबार पांच दशक पहले तक प्रमुख व्यापार में शामिल था। मुनस्यारी, धारचूला के लोग पहले तिब्बत की ज्ञानिमा और तकलाकोट मंडी से व्यापार करते थे। वहीं से तिब्बती भेड़ों का ऊन खरीदकर घोड़े-खच्चरों, भेड़-बकरियों में लादकर लाते थे। इसके बाद ऊन के कपड़े तैयार किए जाते थे। तिब्बत से लाया जाने वाले काले और सफेद ऊन को मिलाकर ग्रे कलर (स्थानीय भाषा में भन्नेन रंग) बनाया जाता था। कताई, सफाई, रंगाई करके कोट, पंखी, दन-कालीन, आसन, मफलर, टोपी बनाकर बाजार में बेचे जाते थे।
वर्ष 1957 से ऊनी कपड़ों का कारोबार कर रहे बूंगा निवासी 82 वर्षीय कालू राम ने बताया कि वर्ष 1957 से 1962 तक तिब्बत से ही व्यापार किया। 1962 के बाद तिब्बत से ऊन आना बंद हुआ तो सरकार ने पशुपालन विभाग के माध्यम से 1962 से भेड़ पालन शुरू किया। इसके तहत विभाग ने किसानों को भेड़ दिलाए। इसके बाद से स्थानीय भेड़ों के ऊन का उपयोग होने लगा। कालू राम बताते हैं कि 1962 से 1966 के बीच ऊनी कोटपट्टू 800 रुपये का था जो अब 2000 रुपये का है। 600 रुपये में जो पंखी बिकती थी अब उसकी कीमत 1200 रुपये है। कालू कहते हैं कि सरकारों ने इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। मुनस्यारी में उद्योग विभाग ने कताई बुनाई केंद्र खोला लेकिन देखभाल में कमी के कारण 2006-07 में इसे बंद कर दिया गया।
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जौलजीबी मेले में एक व्यापारी बेचता था 100 दन
मुनस्यारी। ऐतिहासिक जौलजीबी मेला भी एक दौर में ऊनी कपड़ों के लिए ही मुख्य रूप से जाना जाता था। स्थानीय लोग भी ऊनी कपड़े खरीदने के लिए हर साल इस मेले का इंतजार करते थे। कालूराम मुनस्यारी के अकेले ऐसे ऊनी कारोबारी हैं जो 1965 से लगातार अंतरराष्ट्रीय मेले जौलजीबी, उत्तरायणी मेला बागेश्वर, गढ़वाल, चौबटिया, द्वाराहाट, रामनगर, हल्द्वानी में स्टॉल लगाते हैं। वह कहते हैं कि पहले एक ही दिन में जौलजीबी मेले में 100-100 दन कालीन, 50-60 पंखी बिक जाती थी, लेकिन आज दन, कालीन की बिक्री आधी से भी कम रह गई है।
आज 400 परिवार ही रह गए इस कारोबार में
मुनस्यारी। लगभग दस वर्ष पूर्व तक मुनस्यारी के बूंगा, मल्ला तल्ला घोरापट्टा, नईबस्ती, धापा, दुम्मर, जैंती, सरमोली, नानासेम, दरांती, सुरिंग में करीब 845 परिवार ऊनी कारोबार करते थे। इसमें से अब लगभग 400 परिवार ही इस कारोबार में रह गए हैं। अविभाजित उत्तर प्रदेश के दौरान जो लोग इस क्षेत्र में थे, वे लोग ऊन की खरीदारी करने के लिए भदोही, मिर्जापुर जाते थे। जहां से दन, कालीन, आसन के लिए ऊन खरीदकर लाते थे और घर पर ही उसमें रंग करते थे। तब यहां के दन, कालीन, पंखी, चुटके, स्वेटर, आसन गुजरात के सूरत के व्यापारी ले जाते थे।
2600 रुपये किलो बिक रहा ऊन
मुनस्यारी। अब कारोबारी स्थानीय स्तर से ही ऊन खरीदते हैं। लॉकडाउन से पहले 2400 रुपये प्रति किलो मिलने वाली ऊन की कीमत 2600 रुपये प्रति किलो पहुंच गई है। जलथ गांव निवासी ऊन कारोबारी मंजू देवी बताती हैं कि पिछले वर्ष तक सालाना करीब चार लाख तक के अंगोरा स्वेटर, टोपी, दस्ताने, मफलर, दन, कालीन आदि अप्रैल, जुलाई, अक्तूबर तीन शिफ्टों में बिक जाते थे। इस बार कोरोना के कारण सभी कपड़े डंप हैं। पहले की अपेक्षा बिक्री में 50 प्रतिशत की कमी आ चुकी थी। अब कोरोना महामारी के कारण लगभग 80 प्रतिशत बाजार और गिर गया है।
3000 हजार रुपये में मिलती है अंगोरा के ऊन से बनी स्वेटर
मुनस्यारी। जलथ निवासी हीरा रावत ने बताया कि इस वर्ष तो पूरा कारोबार ही चौपट हो गया है। लॉकडाउन से पहले अंगोरा खरगोश के ऊन से बनी फुल स्वेटर 3000, हाफ स्वेटर 2100, टोपी 350, दस्ताने 450 रुपये में बिकते थे। इस बार तो पर्यटक भी नहीं पहुंच रहे हैं। सरकार को ऊनी कारोबारियों के लिए राहत पैकेज देना चाहिए। साथ ही इन उत्पादों के लिए बाजार दिलाना चाहिए। उन्होंने बताया कि हम लोग समूह से भी जुड़े हैं। सरस बाजार और माटी संगठन भी बिक्री न होने के कारण ऊनी सामान लौटा चुके हैं।
नई पीढ़ी नहीं जुड़ रही इस कारोबार से
मुनस्यारी। दुम्मर गांव के प्रधान पंकज सिंह ने बताया कि पहले गांव के 20 से 25 परिवार ऊनी कारोबार करते थे। बाजार न मिलने और मेहनताना ठीक से न मिलने पर अब मात्र 10 से 12 परिवार इस कार्य से जुड़े हैं। उन्होंने बताया कि अब नए लोग इस कारोबार से नहीं जुड़ रहे हैं। कहा कि ऊनी सामान की बिक्री नहीं होती है। अब केवल मांग पर ही दन कालीन या स्वेटर बनाते हैं।
पर्यटक नहीं आने से कारोबारी मायूस
मुनस्यारी। कारोना के कारण इस बार पर्यटक नहीं आ रहे हैं। दरकोट निवासी ऊन कारोबार से जुड़े रमेश पांगती एवं दमयंती पांगती कहते हैं कि दरकोट गांव में करीब 16 परिवार ही इस कारोबार से जुड़े हैं। उन्होंने बताया कि गांव की महिलाएं समूह के माध्यम से भी इस कार्य से जुड़ी हैं। रमेश पांगती ने बताया कि हमारे बच्चे और नई पीढ़ी इस कारोबार से बच रही है। पिछले वर्ष तक दरकोट गांव के कारोबारियों का करीब 10 से 12 लाख तक का ऊनी सामान बिकता था लेकिन इस बार मात्र छह पर्यटक ही पहुंचे हैं। मुनस्यारी के इस ऊनी कारोबार को उबारने के लिए तकनीक के साथ ही प्रशिक्षण, सरकारी अनुदान एवं बाजार उपलब्ध कराने की भी दरकार है।
ऊनी उद्योग को बढ़ावा देने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। परंपरागत डिजाइनों के स्थान पर नए डिजाइनयुक्त दन, कालीन के लिए ऊनी कारोबारियों को प्रेरित किया जा रहा है। इसके लिए ऊन उद्योग से जुड़े लोगों को प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।
- कविता भगत, महाप्रबंधक उद्योग केंद्र पिथौरागढ़।
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सीमांत मुनस्यारी-धारचूला का ऊन कारोबार पांच दशक पहले तक प्रमुख व्यापार में शामिल था। मुनस्यारी, धारचूला के लोग पहले तिब्बत की ज्ञानिमा और तकलाकोट मंडी से व्यापार करते थे। वहीं से तिब्बती भेड़ों का ऊन खरीदकर घोड़े-खच्चरों, भेड़-बकरियों में लादकर लाते थे। इसके बाद ऊन के कपड़े तैयार किए जाते थे। तिब्बत से लाया जाने वाले काले और सफेद ऊन को मिलाकर ग्रे कलर (स्थानीय भाषा में भन्नेन रंग) बनाया जाता था। कताई, सफाई, रंगाई करके कोट, पंखी, दन-कालीन, आसन, मफलर, टोपी बनाकर बाजार में बेचे जाते थे।
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वर्ष 1957 से ऊनी कपड़ों का कारोबार कर रहे बूंगा निवासी 82 वर्षीय कालू राम ने बताया कि वर्ष 1957 से 1962 तक तिब्बत से ही व्यापार किया। 1962 के बाद तिब्बत से ऊन आना बंद हुआ तो सरकार ने पशुपालन विभाग के माध्यम से 1962 से भेड़ पालन शुरू किया। इसके तहत विभाग ने किसानों को भेड़ दिलाए। इसके बाद से स्थानीय भेड़ों के ऊन का उपयोग होने लगा। कालू राम बताते हैं कि 1962 से 1966 के बीच ऊनी कोटपट्टू 800 रुपये का था जो अब 2000 रुपये का है। 600 रुपये में जो पंखी बिकती थी अब उसकी कीमत 1200 रुपये है। कालू कहते हैं कि सरकारों ने इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। मुनस्यारी में उद्योग विभाग ने कताई बुनाई केंद्र खोला लेकिन देखभाल में कमी के कारण 2006-07 में इसे बंद कर दिया गया।
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जौलजीबी मेले में एक व्यापारी बेचता था 100 दन
मुनस्यारी। ऐतिहासिक जौलजीबी मेला भी एक दौर में ऊनी कपड़ों के लिए ही मुख्य रूप से जाना जाता था। स्थानीय लोग भी ऊनी कपड़े खरीदने के लिए हर साल इस मेले का इंतजार करते थे। कालूराम मुनस्यारी के अकेले ऐसे ऊनी कारोबारी हैं जो 1965 से लगातार अंतरराष्ट्रीय मेले जौलजीबी, उत्तरायणी मेला बागेश्वर, गढ़वाल, चौबटिया, द्वाराहाट, रामनगर, हल्द्वानी में स्टॉल लगाते हैं। वह कहते हैं कि पहले एक ही दिन में जौलजीबी मेले में 100-100 दन कालीन, 50-60 पंखी बिक जाती थी, लेकिन आज दन, कालीन की बिक्री आधी से भी कम रह गई है।
आज 400 परिवार ही रह गए इस कारोबार में
मुनस्यारी। लगभग दस वर्ष पूर्व तक मुनस्यारी के बूंगा, मल्ला तल्ला घोरापट्टा, नईबस्ती, धापा, दुम्मर, जैंती, सरमोली, नानासेम, दरांती, सुरिंग में करीब 845 परिवार ऊनी कारोबार करते थे। इसमें से अब लगभग 400 परिवार ही इस कारोबार में रह गए हैं। अविभाजित उत्तर प्रदेश के दौरान जो लोग इस क्षेत्र में थे, वे लोग ऊन की खरीदारी करने के लिए भदोही, मिर्जापुर जाते थे। जहां से दन, कालीन, आसन के लिए ऊन खरीदकर लाते थे और घर पर ही उसमें रंग करते थे। तब यहां के दन, कालीन, पंखी, चुटके, स्वेटर, आसन गुजरात के सूरत के व्यापारी ले जाते थे।
2600 रुपये किलो बिक रहा ऊन
मुनस्यारी। अब कारोबारी स्थानीय स्तर से ही ऊन खरीदते हैं। लॉकडाउन से पहले 2400 रुपये प्रति किलो मिलने वाली ऊन की कीमत 2600 रुपये प्रति किलो पहुंच गई है। जलथ गांव निवासी ऊन कारोबारी मंजू देवी बताती हैं कि पिछले वर्ष तक सालाना करीब चार लाख तक के अंगोरा स्वेटर, टोपी, दस्ताने, मफलर, दन, कालीन आदि अप्रैल, जुलाई, अक्तूबर तीन शिफ्टों में बिक जाते थे। इस बार कोरोना के कारण सभी कपड़े डंप हैं। पहले की अपेक्षा बिक्री में 50 प्रतिशत की कमी आ चुकी थी। अब कोरोना महामारी के कारण लगभग 80 प्रतिशत बाजार और गिर गया है।
3000 हजार रुपये में मिलती है अंगोरा के ऊन से बनी स्वेटर
मुनस्यारी। जलथ निवासी हीरा रावत ने बताया कि इस वर्ष तो पूरा कारोबार ही चौपट हो गया है। लॉकडाउन से पहले अंगोरा खरगोश के ऊन से बनी फुल स्वेटर 3000, हाफ स्वेटर 2100, टोपी 350, दस्ताने 450 रुपये में बिकते थे। इस बार तो पर्यटक भी नहीं पहुंच रहे हैं। सरकार को ऊनी कारोबारियों के लिए राहत पैकेज देना चाहिए। साथ ही इन उत्पादों के लिए बाजार दिलाना चाहिए। उन्होंने बताया कि हम लोग समूह से भी जुड़े हैं। सरस बाजार और माटी संगठन भी बिक्री न होने के कारण ऊनी सामान लौटा चुके हैं।
नई पीढ़ी नहीं जुड़ रही इस कारोबार से
मुनस्यारी। दुम्मर गांव के प्रधान पंकज सिंह ने बताया कि पहले गांव के 20 से 25 परिवार ऊनी कारोबार करते थे। बाजार न मिलने और मेहनताना ठीक से न मिलने पर अब मात्र 10 से 12 परिवार इस कार्य से जुड़े हैं। उन्होंने बताया कि अब नए लोग इस कारोबार से नहीं जुड़ रहे हैं। कहा कि ऊनी सामान की बिक्री नहीं होती है। अब केवल मांग पर ही दन कालीन या स्वेटर बनाते हैं।
पर्यटक नहीं आने से कारोबारी मायूस
मुनस्यारी। कारोना के कारण इस बार पर्यटक नहीं आ रहे हैं। दरकोट निवासी ऊन कारोबार से जुड़े रमेश पांगती एवं दमयंती पांगती कहते हैं कि दरकोट गांव में करीब 16 परिवार ही इस कारोबार से जुड़े हैं। उन्होंने बताया कि गांव की महिलाएं समूह के माध्यम से भी इस कार्य से जुड़ी हैं। रमेश पांगती ने बताया कि हमारे बच्चे और नई पीढ़ी इस कारोबार से बच रही है। पिछले वर्ष तक दरकोट गांव के कारोबारियों का करीब 10 से 12 लाख तक का ऊनी सामान बिकता था लेकिन इस बार मात्र छह पर्यटक ही पहुंचे हैं। मुनस्यारी के इस ऊनी कारोबार को उबारने के लिए तकनीक के साथ ही प्रशिक्षण, सरकारी अनुदान एवं बाजार उपलब्ध कराने की भी दरकार है।
ऊनी उद्योग को बढ़ावा देने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। परंपरागत डिजाइनों के स्थान पर नए डिजाइनयुक्त दन, कालीन के लिए ऊनी कारोबारियों को प्रेरित किया जा रहा है। इसके लिए ऊन उद्योग से जुड़े लोगों को प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।
- कविता भगत, महाप्रबंधक उद्योग केंद्र पिथौरागढ़।