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सतगढ़ गांव से उठा मां जयंती का डोला
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पिथौरागढ़ जिले के सतगढ़ गांव से मां जयंती के दिव्य डोले को ध्वज मंदिर ले जाते श्रद्धालु। संवाद
- फोटो : PITHORAGARH
पिथौरागढ़। आराध्य देवी मां जयंती का डोला परंपरागत तरीके से ध्वज मंदिर ले जाया गया। हरतालिका तृतीया को ग्रामीणों और श्रद्धालुओं ने विधिविधान के साथ डोले की पूजा-अर्चना की। इसके बाद मां जयंती के जयकारों के साथ डोले को पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ तीन किमी की खड़ी चढ़ाई पार कर ध्वज मंदिर पहुंचाया गया।
सतगढ़ ग्राम पंचायत के खतेड़ा तोक से मंगलवार को पारंपरिक तरीके से ढोल, दमाऊ, शंख, भकोरों की ध्वनि के साथ मां जयंती का डोला उठाया गया। घने जंगल से होते हुए तीन किमी की खड़ी चढ़ाई पार कर डोले को ध्वज मंदिर पहुंचाया गया। यहां देवडांगरों ने खंडेनाथ स्वामी, मां जयंती की पूजा, अर्चना की।
मंदिर परिक्रमा के बाद देवडांगरों ने अवतरित होकर लोगों को आशीर्वाद दिया। मेले में कनालीछीना, पलेटा, खूना, सिरड़, मड़, मनाले, ख्वांतड़ी, सिरोली आदि स्थानों से श्रद्धालु पहुंचे। इस मौके पर मुख्य पुजारी नंदाबल्लभ कापड़ी, नवीन कापड़ी, कैलाश कापड़ी, प्रकाश कापड़ी, दिगंबर कापड़ी, चंद्रबल्लभ कापड़ी, भास्कर कापड़ी, भुवन कापड़ी आदि रहे।
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ध्वज मेले के साथ ही शुरू होती है सोरघाटी के मेलों की शुरुआत
पिथौरागढ़। ध्वज की मां जयंती में लोगों की गहरी आस्था है। प्रत्येक वर्ष हरतालिका तृतीया को मां जयंती का डोला सतगढ़ गांव से उठाया जाता है। ध्वज मेला संपन्न होने के बाद थलकेदार मेला, मोस्टामानू मेला, लछैर मेला, जगनाथ मेला, घाड़ी मेला, छड़नदेव मेला लगता है।
मनोकामना की होती है पूर्ति
पिथौरागढ़। ऐसी मान्यता है कि ध्वज मां जयंती के पवित्र डोले के नीचे से निकलने से मनोकामना की पूर्ति होती है। इस कारण जिले के विभिन्न हिस्सों से लोगों बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। ध्वज मंदिर जाने के लिए श्रद्धालुओं को सात दिन तक शाकाहारी भोजन करना पड़ता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।
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सतगढ़ ग्राम पंचायत के खतेड़ा तोक से मंगलवार को पारंपरिक तरीके से ढोल, दमाऊ, शंख, भकोरों की ध्वनि के साथ मां जयंती का डोला उठाया गया। घने जंगल से होते हुए तीन किमी की खड़ी चढ़ाई पार कर डोले को ध्वज मंदिर पहुंचाया गया। यहां देवडांगरों ने खंडेनाथ स्वामी, मां जयंती की पूजा, अर्चना की।
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मंदिर परिक्रमा के बाद देवडांगरों ने अवतरित होकर लोगों को आशीर्वाद दिया। मेले में कनालीछीना, पलेटा, खूना, सिरड़, मड़, मनाले, ख्वांतड़ी, सिरोली आदि स्थानों से श्रद्धालु पहुंचे। इस मौके पर मुख्य पुजारी नंदाबल्लभ कापड़ी, नवीन कापड़ी, कैलाश कापड़ी, प्रकाश कापड़ी, दिगंबर कापड़ी, चंद्रबल्लभ कापड़ी, भास्कर कापड़ी, भुवन कापड़ी आदि रहे।
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ध्वज मेले के साथ ही शुरू होती है सोरघाटी के मेलों की शुरुआत
पिथौरागढ़। ध्वज की मां जयंती में लोगों की गहरी आस्था है। प्रत्येक वर्ष हरतालिका तृतीया को मां जयंती का डोला सतगढ़ गांव से उठाया जाता है। ध्वज मेला संपन्न होने के बाद थलकेदार मेला, मोस्टामानू मेला, लछैर मेला, जगनाथ मेला, घाड़ी मेला, छड़नदेव मेला लगता है।
मनोकामना की होती है पूर्ति
पिथौरागढ़। ऐसी मान्यता है कि ध्वज मां जयंती के पवित्र डोले के नीचे से निकलने से मनोकामना की पूर्ति होती है। इस कारण जिले के विभिन्न हिस्सों से लोगों बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। ध्वज मंदिर जाने के लिए श्रद्धालुओं को सात दिन तक शाकाहारी भोजन करना पड़ता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।