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संस्कृति और लोक कला को बढ़ावा देना जरूरी
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पिथौरागढ़ रामलीला मैदान में चिंतन शिविर में मौजूद कलाकार और अन्य। संवाद
- फोटो : PITHORAGARH
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पिथौरागढ़। आयुष म्यूजिक एकेडमी की ओर से कलाकारों के लिए चिंतन शिविर का आयोजन किया गया। इसमें कला और कलाकारों के उत्थान के लिए चर्चा और सुझाव दिए गए। वक्ताओं ने कहा संस्कृति और लोक कला को बढ़ावा देना बहुत जरूरी है।
रविवार को रामलीला मैदान नगरपालिका में चिंतन शिविर कार्यक्रम का शुभारंभ शिक्षाविद् डॉ. अशोक पंत ने किया। एकेडमी के प्रकाश कोटवाल ने कहा कि मंच की स्थापना का मुख्य उद्देश्य सभी कलाकारों और प्रतिभाओं को मंच प्रदान कराना है।
उन्होंने कहा कलाकार अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए हमेशा तैयार रहता है। मगर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का वृहद स्तर पर आयोजन नहीं होने से उन्हें भी काफी मुश्किलें आती हैं।
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कोविड के दौरान कलाकारों को मंच नहीं मिल सका था। कई कलाकार मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाकर ही आजीविका चलाते हैं। ऐसे में उनके लिए एक साल बेहद बुरे दौर साबित हुआ है।
नानू बिष्ट ने कहा शासन-प्रशासन को छोटे-छोटे सांस्कृतिक और लोक पर्व कार्यक्रमों को बढ़ावा देते हुए कलाकारों को मंच और रोजगार प्रदान करना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय एकता मंच के महेश बराल ने कहा कि लोक वाद्य यंत्र बजाने वाले कलाकार, गीतकार, नाटककारों को एक मंच पर लाने के सामूहिक प्रयास होने चाहिए। सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन लगातार होना चाहिए। वहां दयानंद भट्ट, आशु पुनेठा, ललित मोहन जोशी, अशोक बोरा, वैभव, मनोज जोशी आदि मौजूद रहे।
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रविवार को रामलीला मैदान नगरपालिका में चिंतन शिविर कार्यक्रम का शुभारंभ शिक्षाविद् डॉ. अशोक पंत ने किया। एकेडमी के प्रकाश कोटवाल ने कहा कि मंच की स्थापना का मुख्य उद्देश्य सभी कलाकारों और प्रतिभाओं को मंच प्रदान कराना है।
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उन्होंने कहा कलाकार अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए हमेशा तैयार रहता है। मगर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का वृहद स्तर पर आयोजन नहीं होने से उन्हें भी काफी मुश्किलें आती हैं।
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कोविड के दौरान कलाकारों को मंच नहीं मिल सका था। कई कलाकार मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाकर ही आजीविका चलाते हैं। ऐसे में उनके लिए एक साल बेहद बुरे दौर साबित हुआ है।
नानू बिष्ट ने कहा शासन-प्रशासन को छोटे-छोटे सांस्कृतिक और लोक पर्व कार्यक्रमों को बढ़ावा देते हुए कलाकारों को मंच और रोजगार प्रदान करना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय एकता मंच के महेश बराल ने कहा कि लोक वाद्य यंत्र बजाने वाले कलाकार, गीतकार, नाटककारों को एक मंच पर लाने के सामूहिक प्रयास होने चाहिए। सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन लगातार होना चाहिए। वहां दयानंद भट्ट, आशु पुनेठा, ललित मोहन जोशी, अशोक बोरा, वैभव, मनोज जोशी आदि मौजूद रहे।