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श्मशान में बदली इंसानों की बस्ती
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बंगापानी तहसील के टांगा गांव में आपदा में इस तरह कहर बरपाया है। संवाद न्यूज एजेंसी
- फोटो : PITHORAGARH
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टांगा (पिथौरागढ़)। सीमांत पिथौरागढ़ जिले का टांगा गांव कभी चर्चा में नहीं रहा। मगर जब इस गांव का नाम लोगों ने सुना, तो उनके मुंह से एक आह निकली। अब ये गांव इंसानों की बस्ती नहीं रह गई, बल्कि जमीन फटने से श्मशान में तब्दील हो गई है। गांव के जिन लोगों ने मूसलाधार बारिश के बीच रात का खौफनाक मंजर देखा, उन्हें दिन के वक्त भी हर आहट डराती है। हर डरा चेहरा इसे साफ दिखा रहा था। रात को लापता हुए 11 लोगों के बीच बच गए लोगों में आगे की जिंदगी की कम से कम इस गांव में अब कोई आस नहीं है। वे यहां से जल्द से जल्द दूसरी जगह जाना चाहते हैं। अपनों को गंवाने वाले इन लोगों के मुंह से बार-बार दूसरी जगह विस्थापन की पुकार निकल रही है।
टांगा गांव में करीब 500 मीटर में 200 से अधिक जगह जमीन फटी है। मकान को मलबे, तो खेत को रेगिस्तान में तब्दील हुए। गांव में भले ही 66 लोग मौजूद हैं, लेकिन ऐसा सूनापन, सन्नाटा और शोक गांव ने न कभी देखा न कभी कल्पना की। सकते में आए गांव को काठ मार गया। किसी के मुंह से शब्द नहीं निकल रहे। बहुत कहने पर इक्कादुक्का लोग बताते हैं कि नदी पहले से कटाव कर रही थी। लेकिन किसी ने ये नहीं सोचा कि टांगा के हंसते-खेलते लोगों के लिए कल-कल करती ये नदी काल बन जाएगी। गांव के महिमन कहते हैं कि कहीं श्मशान में रहा जाता है क्या? हम अब यहां क्यों रहें? कैसे रहें? हमें नहीं रहना? हमें कभी भी भेज दो, पर यहां से ले जाओ। ये बाते गांव के लोग कातर हो कहते हैं। मौत के मुंह से बचे गांव के लोग सोमवार को दिनभर यही कहते रहे।
तबाही के मंजर के गवाह बने 80 साल के चंद्र राम रात रात को चैन की नींद सोये थे। एकाएक तेज आवाज ने उनकी नींद तोड़ी, तो जो देखा उसने उनके सपनों को भी तोड़ा। कहते हैं कि वे खुद बहू, बेटे और पोते को लेकर सुरक्षित ऊपर की तरफ को दौड़ पड़े और शोर मचाते गांव के दूसरे लोगों को अनहोनी से अगाह किया। सभी 66 लोगों ने मूसलाधार बारिश के बीच एक साथ रात गुजारी। चंद्र राम बताते हैं कि अपनी जिंदगी में शायद इतनी स्फूर्ति उनमें कभी नहीं रही, जितनी सैलाब की आवाज आने पर टार्च की रोशनी से बाहर देखने पर आई। बमुश्किल 15 मीटर दूर आए सैलाब ने माधो सिंह के मकान की छत, दीवार को मलबे में तब्दील कर दिया। शोर के बावजूद एक हल्की सी चीख सुनाई दी। शायद ये दो मासूमों की चीख थी। और यह मलबा हंसते-खेलते दो मासूमों का कब्रगाह बन गया। बुरी तरह टूट चुके इस मकान में गणेश सिंह के दो मासूम (छठी कक्षा दिवांश व चौथी कक्षा लतिका) बच्चों के शव दूर से नजर आ रहे हैं।
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जीतराम का मकान आंखों देखते नदी में समा गया। और समा गई तीन जिंदगियां भी। तीनों लोगों में से किसी का भी अभी पता नहीं चल सका है। रात में पड़ोस में गया एक बच्चा इस विनाशलीला से बच गया। जीत राम के मकान से सटा पदमा देवी का मकान भी नदी में ऐसे बहा जैसे कोई घास का तिनका हो। अब यहां मकान नहीं रौखड़ बचा है। 22 साल का युवा नंदन सिंह तो बच गया, पर मकान के साथ नंदन की मां पदमा देवी और नानी बह गए। इनका अभी कोई अतापता नहीं है। टांगा में नदी से कटाव का खतरा सबसे ज्यादा था। जमीन फटने की वारदात की तो किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। पर तबाही का मंजर वहां हुआ, जो नदी के ऊपरी तरफ होने से सबसे सुरक्षित माने जाते थे। शायद नियति को यही मंजूर था।
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टांगा गांव में करीब 500 मीटर में 200 से अधिक जगह जमीन फटी है। मकान को मलबे, तो खेत को रेगिस्तान में तब्दील हुए। गांव में भले ही 66 लोग मौजूद हैं, लेकिन ऐसा सूनापन, सन्नाटा और शोक गांव ने न कभी देखा न कभी कल्पना की। सकते में आए गांव को काठ मार गया। किसी के मुंह से शब्द नहीं निकल रहे। बहुत कहने पर इक्कादुक्का लोग बताते हैं कि नदी पहले से कटाव कर रही थी। लेकिन किसी ने ये नहीं सोचा कि टांगा के हंसते-खेलते लोगों के लिए कल-कल करती ये नदी काल बन जाएगी। गांव के महिमन कहते हैं कि कहीं श्मशान में रहा जाता है क्या? हम अब यहां क्यों रहें? कैसे रहें? हमें नहीं रहना? हमें कभी भी भेज दो, पर यहां से ले जाओ। ये बाते गांव के लोग कातर हो कहते हैं। मौत के मुंह से बचे गांव के लोग सोमवार को दिनभर यही कहते रहे।
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तबाही के मंजर के गवाह बने 80 साल के चंद्र राम रात रात को चैन की नींद सोये थे। एकाएक तेज आवाज ने उनकी नींद तोड़ी, तो जो देखा उसने उनके सपनों को भी तोड़ा। कहते हैं कि वे खुद बहू, बेटे और पोते को लेकर सुरक्षित ऊपर की तरफ को दौड़ पड़े और शोर मचाते गांव के दूसरे लोगों को अनहोनी से अगाह किया। सभी 66 लोगों ने मूसलाधार बारिश के बीच एक साथ रात गुजारी। चंद्र राम बताते हैं कि अपनी जिंदगी में शायद इतनी स्फूर्ति उनमें कभी नहीं रही, जितनी सैलाब की आवाज आने पर टार्च की रोशनी से बाहर देखने पर आई। बमुश्किल 15 मीटर दूर आए सैलाब ने माधो सिंह के मकान की छत, दीवार को मलबे में तब्दील कर दिया। शोर के बावजूद एक हल्की सी चीख सुनाई दी। शायद ये दो मासूमों की चीख थी। और यह मलबा हंसते-खेलते दो मासूमों का कब्रगाह बन गया। बुरी तरह टूट चुके इस मकान में गणेश सिंह के दो मासूम (छठी कक्षा दिवांश व चौथी कक्षा लतिका) बच्चों के शव दूर से नजर आ रहे हैं।
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जीतराम का मकान आंखों देखते नदी में समा गया। और समा गई तीन जिंदगियां भी। तीनों लोगों में से किसी का भी अभी पता नहीं चल सका है। रात में पड़ोस में गया एक बच्चा इस विनाशलीला से बच गया। जीत राम के मकान से सटा पदमा देवी का मकान भी नदी में ऐसे बहा जैसे कोई घास का तिनका हो। अब यहां मकान नहीं रौखड़ बचा है। 22 साल का युवा नंदन सिंह तो बच गया, पर मकान के साथ नंदन की मां पदमा देवी और नानी बह गए। इनका अभी कोई अतापता नहीं है। टांगा में नदी से कटाव का खतरा सबसे ज्यादा था। जमीन फटने की वारदात की तो किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। पर तबाही का मंजर वहां हुआ, जो नदी के ऊपरी तरफ होने से सबसे सुरक्षित माने जाते थे। शायद नियति को यही मंजूर था।