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व्यापारिक नहीं धार्मिक मेले के रूप में हुई जौलजीबी मेले की शुरुआत
Pithoragarh
Updated Tue, 13 Nov 2012 12:00 PM IST
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अस्कोट (पिथौरागढ़)। 14 तारीख को अस्कोट पाल राजवंश से जुड़े 141 साल पुराने ऐतिहासिक जौलजीबी मेले का आगाज हो जाएगा। पाल राजवंश के पास मौजूद दस्तावेजों से मेले की ऐतिहासिकता की परतें खुली हैं। रहस्योद्घाटन हुआ है कि इस मेले की शुरुआत व्यापारिक मेले के रूप में न होकर धार्मिक मेले के रूप में हुई थी। अस्कोट रियासत के राजा पुष्कर पाल ने जौलजीबी में काली, गोरी नदी के संगम में ज्वालेश्वर महादेव के मंदिर की स्थापना के बाद मेले की नींव डाली थी।
अस्कोट, सीरा (डीडीहाट), सोर (पिथौरागढ़), दारमा (धारचूला), जोहार (मुनस्यारी) पर सदियों राज करने वाले पाल राजवंश के पास मौजूद दस्तावेज बताते हैं कि 1871 में तत्कालीन राजा पुष्कर पाल ने काली, गोरी नदी के संगम जौलजीबी में कैलास मानसरोवर यात्रियों की सुविधा और रियासत के लोगों के मेलजोल के लिए मेले का आयोजन करने का निर्णय लिया। संगम में जालेश्वर महादेव की स्थापना करने के बाद राजा ने पहले मेले का उद्घाटन किया था और हर वर्ष एक महीने का मेला आयोजित करने का ऐलान किया। पुष्कर पाल का शासन 1903 तक रहा। इस काल में उन्होंने जौलजीबी मेले का सफल संचालन करवाया। चीन, तिब्बत, नेपाल के नजदीक होने के कारण मेले ने जल्द ही व्यापारिक मेले का रूप ले लिया।
पुष्कर चंद के बाद 1928 तक पुष्कर पाल के भाई गजेंद्र पाल ने अस्कोट रियासत में शासन किया। दस्तावेज बताते हैं कि गजेंद्र पाल को अंग्रेजी शासन में मजिस्ट्रेटी पावर मिली थी। 1928 से 1938 तक अस्कोट में पुष्कर पाल के दूसरे भाई विक्रम पाल का राज रहा। युवराज टिकेंद्र पाल के नाबालिग होने के कारण अस्कोट 1938 से 1954 तक अंग्रेजों के अधीन रहा। 1954 में युवराज टिकेंद्र के विवाह के समय अंग्रेजों ने उन्हें रियासत की गद्दी सौंप दी। 11 नवंबर 1967 को अस्कोट रियासत को भारत सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया। अस्कोट रियासत के दौर में मेला पुष्पित, पल्लवित हुआ। अस्कोट राजवंश के वर्तमान कुंवर भानु राज पाल कहते हैं कि उन्हें सकून मिलता है कि उनके पुरुखों की निशानी जौलजीबी मेले का प्रशासन हर साल सफलता पूर्वक संचालन कर रहा है।
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अस्कोट, सीरा (डीडीहाट), सोर (पिथौरागढ़), दारमा (धारचूला), जोहार (मुनस्यारी) पर सदियों राज करने वाले पाल राजवंश के पास मौजूद दस्तावेज बताते हैं कि 1871 में तत्कालीन राजा पुष्कर पाल ने काली, गोरी नदी के संगम जौलजीबी में कैलास मानसरोवर यात्रियों की सुविधा और रियासत के लोगों के मेलजोल के लिए मेले का आयोजन करने का निर्णय लिया। संगम में जालेश्वर महादेव की स्थापना करने के बाद राजा ने पहले मेले का उद्घाटन किया था और हर वर्ष एक महीने का मेला आयोजित करने का ऐलान किया। पुष्कर पाल का शासन 1903 तक रहा। इस काल में उन्होंने जौलजीबी मेले का सफल संचालन करवाया। चीन, तिब्बत, नेपाल के नजदीक होने के कारण मेले ने जल्द ही व्यापारिक मेले का रूप ले लिया।
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पुष्कर चंद के बाद 1928 तक पुष्कर पाल के भाई गजेंद्र पाल ने अस्कोट रियासत में शासन किया। दस्तावेज बताते हैं कि गजेंद्र पाल को अंग्रेजी शासन में मजिस्ट्रेटी पावर मिली थी। 1928 से 1938 तक अस्कोट में पुष्कर पाल के दूसरे भाई विक्रम पाल का राज रहा। युवराज टिकेंद्र पाल के नाबालिग होने के कारण अस्कोट 1938 से 1954 तक अंग्रेजों के अधीन रहा। 1954 में युवराज टिकेंद्र के विवाह के समय अंग्रेजों ने उन्हें रियासत की गद्दी सौंप दी। 11 नवंबर 1967 को अस्कोट रियासत को भारत सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया। अस्कोट रियासत के दौर में मेला पुष्पित, पल्लवित हुआ। अस्कोट राजवंश के वर्तमान कुंवर भानु राज पाल कहते हैं कि उन्हें सकून मिलता है कि उनके पुरुखों की निशानी जौलजीबी मेले का प्रशासन हर साल सफलता पूर्वक संचालन कर रहा है।
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