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लोक संस्कृति और पर्वों का संवाहक है सातूं-आठूं 16-40-11
Updated Tue, 29 Aug 2017 11:04 PM IST
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पिथौरागढ़। पहाड़ अपनी अनूठी संस्कृति और लोक पर्वों के लिए ही जाना जाता है। पहाड़ पर इन दिनों सातूं-आठूं की धूम मची है। सातूं-आठूं पहाड़ की लोक संस्कृति और पर्वों का संवाहक है। इस लोक पर्व में लोककला का प्रदर्शन होता है तो ढोल, हुड़का आदि वाद्ययंत्रों की धमक भी यहां देखने को मिलती है। खास बात यह है कि सातूं-आठूं के समय गौरा को पहाड़ की महिलाएं अपने बीच की ही आम महिला की तरह देखती हैं।
सोरघाटी (पिथौरागढ़) के साथ ही कई स्थानों पर इन दिनों सातूं-आठूं पर्व चरम पर है। चांचरी, खेल, ठुलखेल, झोड़ा, बैर आदि लोक विधा का प्रदर्शन कर रहे हैं। हिमालय की गोद पर बसे उत्तराखंड के लोग भगवान शिव के उपासक माने जाते हैं। यही वजह है कि यहां की संस्कृति में भगवान शिव की स्तुति की झलक साफ दिखाई देती है। सातूं-आठूं में पार्वती के भगवान शिव से नाराज होकर अपने मायके हिमालय जाने, भगवान शिव के पार्वती को लेने जाने और विदाई के प्रसंग को केंद्र में रखकर गौरा (पार्वती), महेश्वर (भगवान शंकर) की पूजा की जाती है।
सौं घास (धान के खेतों में होने वाली घास) से भगवान महेश्वर और गौरा की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। नए वस्त्र पहनाकर दोनों प्रतिमाओं को स्थापित किया जाता है। साथ ही शिव-पार्वती को ताजे फल और बिरुड़ (मिश्रित अनाजों का व्यंजन) का भोग लगाया जाता है। बिरुड़ 5 अनाजों गेहूं, गहत, गुरुंश आदि को मिलाकर बनाया जाता है। पांचों अनाजों को पंचमी के दिन पानी में भिगो दिया जाता है। आठूं (अष्टमी) के दिन गौरा-महेश्वर और अन्य मंदिरों में चढ़ाया जाता है।
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इसका व्यंजन बनाकर प्रसाद के रूप में खाया जाता है। मान्यता है कि जब भगवान शिव पार्वती को विदा कर ले जाते हैं तो कलेवा के रूप में उन्हें बिरुड़ दिया गया। इसलिए सातूं-आठूं पर्व में बिरुड़ बनाने की परंपरा है। महिलाएं पति की लंबी उम्र के लिए सातूं-आठूं पर्व पर उपवास रखती हैं। नव विवाहिता इस पर्व में बढ़-चढ़कर भाग लेती हैं।
संस्कृतिकर्मी जनार्दन उप्रेती का कहना है कि पहाड़ की महिलाएं गौरा को आम महिला के रूप में चित्रित करती हैं। लोकगीतों में इसकी झलक दिखती है-ये भुख भदौ गंवरा कि खाणे की आछे, चैत ऊंनी तक उमिया बुकूंनी, असोज ऊंनी तक सिरौली चबूंनी (अर्थात-हे गौरा तू इस भूखे भादो में क्यों आई, चैैत्र के महीने में आती तो भुने हुए गेहूं खाती और अश्विन में आती तो भुने हुए चावल खाती)। संस्कृति के जानकार कै. दीवान सिंह वल्दिया का कहना है कि सातूं-आठूं का पर्व आम जनजीवन से जुड़ा है। इसीलिए इस पर्व में लोगों की व्यापक भागीदारी रहती है।
भादो माह की सप्तमी को सातूं-आठूं पर्व का आगाज होता है और तीन दिनों तक पर्व को हर्षोल्लास से मनाया जाता है। जिस तरह गढ़वाल और कुमाऊं के नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ के तल्ला, मल्ला जोहार (नाचनी-मुनस्यारी) में नंदा देवी का पूजन किया जाता है, उसी तरह सोरघाटी (जिला मुख्यालय और उसके आसपास का इलाका) में सदियों से गौरा-महेश्वर पूजन की परंपरा चली आ रही है।
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सोरघाटी (पिथौरागढ़) के साथ ही कई स्थानों पर इन दिनों सातूं-आठूं पर्व चरम पर है। चांचरी, खेल, ठुलखेल, झोड़ा, बैर आदि लोक विधा का प्रदर्शन कर रहे हैं। हिमालय की गोद पर बसे उत्तराखंड के लोग भगवान शिव के उपासक माने जाते हैं। यही वजह है कि यहां की संस्कृति में भगवान शिव की स्तुति की झलक साफ दिखाई देती है। सातूं-आठूं में पार्वती के भगवान शिव से नाराज होकर अपने मायके हिमालय जाने, भगवान शिव के पार्वती को लेने जाने और विदाई के प्रसंग को केंद्र में रखकर गौरा (पार्वती), महेश्वर (भगवान शंकर) की पूजा की जाती है।
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सौं घास (धान के खेतों में होने वाली घास) से भगवान महेश्वर और गौरा की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। नए वस्त्र पहनाकर दोनों प्रतिमाओं को स्थापित किया जाता है। साथ ही शिव-पार्वती को ताजे फल और बिरुड़ (मिश्रित अनाजों का व्यंजन) का भोग लगाया जाता है। बिरुड़ 5 अनाजों गेहूं, गहत, गुरुंश आदि को मिलाकर बनाया जाता है। पांचों अनाजों को पंचमी के दिन पानी में भिगो दिया जाता है। आठूं (अष्टमी) के दिन गौरा-महेश्वर और अन्य मंदिरों में चढ़ाया जाता है।
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इसका व्यंजन बनाकर प्रसाद के रूप में खाया जाता है। मान्यता है कि जब भगवान शिव पार्वती को विदा कर ले जाते हैं तो कलेवा के रूप में उन्हें बिरुड़ दिया गया। इसलिए सातूं-आठूं पर्व में बिरुड़ बनाने की परंपरा है। महिलाएं पति की लंबी उम्र के लिए सातूं-आठूं पर्व पर उपवास रखती हैं। नव विवाहिता इस पर्व में बढ़-चढ़कर भाग लेती हैं।
संस्कृतिकर्मी जनार्दन उप्रेती का कहना है कि पहाड़ की महिलाएं गौरा को आम महिला के रूप में चित्रित करती हैं। लोकगीतों में इसकी झलक दिखती है-ये भुख भदौ गंवरा कि खाणे की आछे, चैत ऊंनी तक उमिया बुकूंनी, असोज ऊंनी तक सिरौली चबूंनी (अर्थात-हे गौरा तू इस भूखे भादो में क्यों आई, चैैत्र के महीने में आती तो भुने हुए गेहूं खाती और अश्विन में आती तो भुने हुए चावल खाती)। संस्कृति के जानकार कै. दीवान सिंह वल्दिया का कहना है कि सातूं-आठूं का पर्व आम जनजीवन से जुड़ा है। इसीलिए इस पर्व में लोगों की व्यापक भागीदारी रहती है।
भादो माह की सप्तमी को सातूं-आठूं पर्व का आगाज होता है और तीन दिनों तक पर्व को हर्षोल्लास से मनाया जाता है। जिस तरह गढ़वाल और कुमाऊं के नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ के तल्ला, मल्ला जोहार (नाचनी-मुनस्यारी) में नंदा देवी का पूजन किया जाता है, उसी तरह सोरघाटी (जिला मुख्यालय और उसके आसपास का इलाका) में सदियों से गौरा-महेश्वर पूजन की परंपरा चली आ रही है।