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यहां नहीं चलती भारतीय संचार सेवा!
Updated Fri, 18 Aug 2017 11:12 PM IST
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पिथौरागढ़। भूस्खलन, भूकंप की घटनाओं के लिहाज से अति संवेदनशील चीन और नेपाल की सीमा से सटे धारचूला क्षेत्र में भारतीय संचार सेवा काम नहीं करती। वहां नेपाली संचार सेवा के भरोसे ही सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है। पड़ोसी देश नेपाल को गरीब देश भले ही आंका जाता हो, लेकिन उसकी पुख्ता संचार सेवा को देख अपने देश की लाचारी साफ झलक रही है। सीमांत के लोग नेपाली सिम का प्रयोग करते हैं, यहां तक कि नेता, अफसर भी नेपाली सिम का ही सहारा लेते हैं। मालपा, मांगती में राहत-बचाव के काम में लगे नोडल अधिकारियों, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ के दलों को तक सिम सहित नेपाली फोन देना प्रशासन की मजबूरी बन गया है।
मालपा, मांगती में बादल फटने की घटना के बाद संचार सेवा की कमी एक बार फिर आड़े आई है। राहत, बचाव की सूचनाएं सही समय पर प्राप्त नहीं हुई। मालपा हादसे के फोटो तक 17 अगस्त को प्राप्त हो पाए। वह भी तब, जब वहां से फोटो लेकर लोग धारचूला लौटे। धारचूला में बीएसएनएल का मोबाइल टावर पहले से है। हाल में एक निजी कंपनी का टावर भी वहां लगा है, लेकिन धारचूला से आगे बढ़ने पर चीन, नेपाल सीमा के गांवों में संचार की कोई सुविधा नहीं है। वहां तो नेपाल के ‘स्काई’, ‘नमस्ते’, ‘मेरो’ कंपनियों के फोन घनघनाते हैं। नेपाल के ‘नमस्ते’ और ‘स्काई’ में थ्रीजी सेवा है। नेपाल के फोन सिग्नल इतने प्रभावी हैं कि जिला मुख्यालय के कई स्थानों पर नेपाली संचार सेवा के सिग्नल काम करते हैं। नेपाल के लोगों को उन स्थानों से बात करता देखा जा सकता है।
जून 2013 के जलप्रलय में धारचूला लोकल की संचार सेवा तक एक महीने तक बंद रही थी, उस समय भी नेपाली संचार सेवा से ही काम चलाया। पुख्ता जानकारी है कि प्रशासन आपदा प्रबंधन में लगे नोडल अधिकारियों के साथ ही एसडीआरएफ, एनडीआरएफ को नेपाली फोन सहित सिम खरीद कर दे रहा है। उससे सूचनाओं का आदान-प्रदान हो रहा है।
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धारचूला प्रदेश ही नहीं देश के प्रमुख धार्मिक तीर्थाटन स्थलों में से एक है। उत्तराखंड से होने वाली कैलाश मानसरोवर की यात्रा का संचालन यहीं से होता है। आदि कैलाश, ऊं पर्वत के दीदार के लिए हर साल भारी संख्या में देशी, विदेशी सैलानी आते हैं। संचार सेवा की बदहाली से यात्री, सैलानी, ट्रैकर भी परेशान होते हैं। इस सब के बावजूद भारत सरकार दो देशों की सीमा से सटे इलाकों की संचार सेवा पुख्ता नहीं कर रही है।
आर्थिक चपत लग रही
नेपाल की संचार सेवा का उपयोग करने में भारतीय नागरिकों को जमकर आर्थिक चपत लग रही है। आईएसडी से एक मिनट की कॉल का 28 रुपया नेपाली यानि 19 रुपये भारतीय खर्च होता है, लेकिन नेपाल सरकार की संचार सेवा का उपयोग करना सीमांत के लोगों की मजबूरी है।
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मालपा, मांगती में बादल फटने की घटना के बाद संचार सेवा की कमी एक बार फिर आड़े आई है। राहत, बचाव की सूचनाएं सही समय पर प्राप्त नहीं हुई। मालपा हादसे के फोटो तक 17 अगस्त को प्राप्त हो पाए। वह भी तब, जब वहां से फोटो लेकर लोग धारचूला लौटे। धारचूला में बीएसएनएल का मोबाइल टावर पहले से है। हाल में एक निजी कंपनी का टावर भी वहां लगा है, लेकिन धारचूला से आगे बढ़ने पर चीन, नेपाल सीमा के गांवों में संचार की कोई सुविधा नहीं है। वहां तो नेपाल के ‘स्काई’, ‘नमस्ते’, ‘मेरो’ कंपनियों के फोन घनघनाते हैं। नेपाल के ‘नमस्ते’ और ‘स्काई’ में थ्रीजी सेवा है। नेपाल के फोन सिग्नल इतने प्रभावी हैं कि जिला मुख्यालय के कई स्थानों पर नेपाली संचार सेवा के सिग्नल काम करते हैं। नेपाल के लोगों को उन स्थानों से बात करता देखा जा सकता है।
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जून 2013 के जलप्रलय में धारचूला लोकल की संचार सेवा तक एक महीने तक बंद रही थी, उस समय भी नेपाली संचार सेवा से ही काम चलाया। पुख्ता जानकारी है कि प्रशासन आपदा प्रबंधन में लगे नोडल अधिकारियों के साथ ही एसडीआरएफ, एनडीआरएफ को नेपाली फोन सहित सिम खरीद कर दे रहा है। उससे सूचनाओं का आदान-प्रदान हो रहा है।
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धारचूला प्रदेश ही नहीं देश के प्रमुख धार्मिक तीर्थाटन स्थलों में से एक है। उत्तराखंड से होने वाली कैलाश मानसरोवर की यात्रा का संचालन यहीं से होता है। आदि कैलाश, ऊं पर्वत के दीदार के लिए हर साल भारी संख्या में देशी, विदेशी सैलानी आते हैं। संचार सेवा की बदहाली से यात्री, सैलानी, ट्रैकर भी परेशान होते हैं। इस सब के बावजूद भारत सरकार दो देशों की सीमा से सटे इलाकों की संचार सेवा पुख्ता नहीं कर रही है।
आर्थिक चपत लग रही
नेपाल की संचार सेवा का उपयोग करने में भारतीय नागरिकों को जमकर आर्थिक चपत लग रही है। आईएसडी से एक मिनट की कॉल का 28 रुपया नेपाली यानि 19 रुपये भारतीय खर्च होता है, लेकिन नेपाल सरकार की संचार सेवा का उपयोग करना सीमांत के लोगों की मजबूरी है।