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गौ रक्षा का लोक पर्व है खतड़वा
Updated Mon, 17 Sep 2018 10:49 PM IST
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पिथौरागढ़। खतड़वा का पर्व धूमधाम के साथ मनाया गया। मान्यता है कि बरसात में गाय और अन्य पशुओं को कई तरह की बीमारी होती है। बरसात खत्म होने और शरद ऋतु के प्रारंभ में पशुओं के रोग-व्याधियों को भगाने के लिए खतड़वा मनाया जाता है।
खतड़वा पर्व को लेकर पहले गांवों में शाम के समय खासा उत्सव का माहौल रहता है। बच्चे गांव से दूर किसी चारागाह के किनारे पेड़ की टहनी को गाढ़ कर उसमें घास-फूस एकत्र कर लकड़ियों की सहायता से पुतला बनाते हैं। शाम को कांस की घास से बूढ़ी-बुड्ढा बनाकर उसे सजाया जाता है। सूर्यास्त के बाद गांव के सभी बच्चे मशाल लेकर हर घर के गोठ या खरक (गोशाला) में जाते हैं। ‘लुत्तो भाग, लुत्तो भाग’ का गाना गाते हुए बच्चे पशुओें के बांधने के स्थल पर मशाल को घुमाते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से पशुओं को होने वाले रोगों और उन्हें हानि पहुंचाने वाली दुष्ट शक्तियों का नाश होता है। बाद में बूढ़े को उखाड़ कर घर की छत पर फेंक दिया जाता है और बूढ़ी को खतड़वे के साथ जला देते हैं। खतड़वे की राख का तिलक बच्चे खुद को और पशुओं को भी लगाते हैं।
कहा जाता है कि खतड़वे के साथ ही पशुओं के अनिष्ट भी समाप्त हो जाते हैं। इस दौरान ककड़ी और अन्य स्थानीय फलों को खाने और बांटने की भी परंपरा है। इतिहासकार डॉ. राम सिंह लिखते हैं कि महिलाएं पहले गीत गाते हुए कहती थीं कि ‘औसों ल्यूंलो, बेटुली ल्यूंलो, गरगिलो ल्यूंलो, गाड़-गधेरान हैं ल्यूंलो, तेरो गुसैं बची रओ, तैं बची रये, एक गोरू बटी गोठ भरी जाओ, एक गुसैं बटी त्येरो भितर भरी जौ’।
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खतड़वा पर्व को लेकर पहले गांवों में शाम के समय खासा उत्सव का माहौल रहता है। बच्चे गांव से दूर किसी चारागाह के किनारे पेड़ की टहनी को गाढ़ कर उसमें घास-फूस एकत्र कर लकड़ियों की सहायता से पुतला बनाते हैं। शाम को कांस की घास से बूढ़ी-बुड्ढा बनाकर उसे सजाया जाता है। सूर्यास्त के बाद गांव के सभी बच्चे मशाल लेकर हर घर के गोठ या खरक (गोशाला) में जाते हैं। ‘लुत्तो भाग, लुत्तो भाग’ का गाना गाते हुए बच्चे पशुओें के बांधने के स्थल पर मशाल को घुमाते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से पशुओं को होने वाले रोगों और उन्हें हानि पहुंचाने वाली दुष्ट शक्तियों का नाश होता है। बाद में बूढ़े को उखाड़ कर घर की छत पर फेंक दिया जाता है और बूढ़ी को खतड़वे के साथ जला देते हैं। खतड़वे की राख का तिलक बच्चे खुद को और पशुओं को भी लगाते हैं।
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कहा जाता है कि खतड़वे के साथ ही पशुओं के अनिष्ट भी समाप्त हो जाते हैं। इस दौरान ककड़ी और अन्य स्थानीय फलों को खाने और बांटने की भी परंपरा है। इतिहासकार डॉ. राम सिंह लिखते हैं कि महिलाएं पहले गीत गाते हुए कहती थीं कि ‘औसों ल्यूंलो, बेटुली ल्यूंलो, गरगिलो ल्यूंलो, गाड़-गधेरान हैं ल्यूंलो, तेरो गुसैं बची रओ, तैं बची रये, एक गोरू बटी गोठ भरी जाओ, एक गुसैं बटी त्येरो भितर भरी जौ’।
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