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Pauri News: अब वेटिवर घास बनेगी तट सुरक्षा की नई आस
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श्रीनगर। पर्वतीय क्षेत्रों की ढालदार भूमि हमेशा से ही भू-कटाव का कारण बनी हुई है। बरसात में नदियाें के तीव्र बहाव से नदी तटों का कटाव शहर और मैदानी क्षेत्रों के लिए खतरा पैदा करता है। साथ ही कटाव को रोकने के लिए किए गए निर्माण कार्य भी नदी के उफान की भेंट चढ़ जाते हैं। ऐसे में अब प्राकृतिक आपदाओं पर काबू पाने की कोशिश में प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग की एक नई पहल देखने को मिलेगी। इस कड़ी में पर्वतीय क्षेत्रों में नदी किनारे स्थित ढालदार क्षेत्रों में अब वेटिवर घास से कटाव को रोकने की परियोजना पर काम किया जा रहा है।पर्वतीय क्षेत्रों में, विशेष रूप से मानसून में नदी किनारे मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए पंडित गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालय पर्यावरण संस्थान के गढ़वाल क्षेत्रीय केंद्र श्रीनगर की ओर से जैविक विधि (वेटिवर घास के पौधरोपण) से भू-कटाव को रोकने की एक अनोखी पहल की जा रही है। संस्थान के प्रभारी व वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. के चंद्रशेखर के नेतृत्व में केंद्र की वैज्ञानिक व परियोजना संचालक डॉ. कुसुम पांडे और डॉ. अरुण जुगरान इस परियोजना को साकार करने में जुटे हैं। प्रयोग के तौर पर जनपद रुद्रप्रयाग के भीरी बांसवाड़ा में करीब 5000 वर्गमीटर क्षेत्र में वेटिवर के पौधों लगाए जाएंगे। इसके लिए संस्थान ने भूमि का चयन कर पौध रोपण की तैयारियां पूरी कर ली हैं। फरवरी के पहले सप्ताह में वेटिवर के पौधों को लगाया जाएगा। इसके बाद यह ट्रायल अलकनंदा नदी किनारे देवप्रयाग से लेकर श्रीनगर, रुद्रप्रयाग और चमोली तक किया जाएगा। इसी के साथ वेटिवर घास की खेती को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय लोेगों को प्रशिक्षित भी किया जाएगा।