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मंजुघोष मेले में पहले दिन चढे़ 43 निशाण
ब्यूरो/अमर उजाला, श्रीनगर
Updated Thu, 12 Nov 2015 09:31 PM IST
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कांडा गांव में प्राचीन मंजुघोष मेला बृहस्पतिवार से शुरू गया है। मेले के पहले दिन बलराज उत्सव में भक्तों ने देवी-देवताओं के निसाण (प्रतीक चिह्न) चढ़ाए। दूसरे दिन भैया दूज उत्सव मनाया जाएगा।
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कांडा गांव में स्थित मंजुघोष महादेव, महाकाली और मंजुदेवी मंदिर स्थित हैं। यहां हर साल दो दिवसीय मेला (बड़ा कांडा व छोटा) होता है। बृहस्पतिवार को यहां मेला शुरू हो गया। मंदिर समिति के अध्यक्ष द्वारिका प्रसाद भट्ट ने बताया कि मेले के पहले दिन 43 निसाण पहुंचे।
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दीपावली के दूसरे दिन होने वाले इस मेले में भारी संख्या में श्रद्धालु निसाण लेकर पहुंचते हैं। मेले में सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर भारी संख्या में पुलिस तैनात की गई है। इस मौके पर एसडीएम रजा अब्बास, नायब तहसीलदार सुंदर सिंह रावत व कोतवाल उत्तम सिंह पूरे मेले के दौरान यहां उपस्थित रहे।
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एक दशक पहले हुई बलि प्रथा बंद
मंजुघोष मेला कांडा में पहले पशुओं की बलि चढ़ाई जाती थी। यहां पशुबलि विरोधियों और समाज सुधारकों के प्रयास से एक दशक पहले बलि प्रथा बंद हो गई। अब यहां केवल निसाण चढ़ाए जाते हैं।
यह है मान्यता
मंजुघोष महादेव मंदिर कामदाह डांडा पर है। शिवपुराण के अनुसार इस पर्वत पर भगवान शंकर ने तपस्या की थी। कामदेव ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए फूलों के वाण चलाकर उनके अंदर कामशक्ति को जागृत किया था। क्रोधित शंकर भगवान ने कामदेव को भष्म कर दिया था। तब से इस पर्वत का नाम कामदाह पर्वत पड़ा। जो कालांतर में कांडा हो गया।
दूसरी कथा है कि मंजू नाम की एक अप्सरा ने यहां शक्ति प्राप्त करने के लिए भगवान शंकर की तपस्या की। उस पर श्रीनगर का राजा कोलासुर मोहित हो गया। जब वह अपने मकसद में सफल नहीं हुआ, तो उसने भैंसे का रूप धारण कर ग्रामीणों पर हमला कर दिया।
यह मंजू देवी को सहन नहीं हुआ। उसने महाकाली का रूप धर कोलासुर का वध कर दिया। उसी की याद में कांडा मेला मनाया जाता है।