{"_id":"67952356546f6eaed60cadfb","slug":"infighting-and-peoples-resentment-became-the-reason-for-bjps-defeat-shrinagar-news-c-5-1-gkp1010-603831-2025-01-25","type":"story","status":"publish","title_hn":"Pauri News: भितरघात व लोगों की नाराजगी बनी भाजपा की हार का कारण","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Pauri News: भितरघात व लोगों की नाराजगी बनी भाजपा की हार का कारण
विज्ञापन
विज्ञापन
श्रीनगर। नगर निगम श्रीनगर में मेयर पद के लिए भाजपा संगठन की ओर से टिकट वितरण में अपनों की अनदेखी से उपजा असंतोष व भितरघात भाजपा की हार का कारण माना जा रहा है। इसी वजह से श्रीनगर के विकास के लिए हुए अनगिनत कार्यों के नाम पर भी भाजपा को जीत का आंकड़ा छूने के लिए वोट नहीं मिल पाए, जबकि श्रीनगर विधायक व कैबिनेट मंत्री डा. धन सिंह रावत की प्रतिष्ठा से जुड़ी इस सीट पर स्टार प्रचारक के तौर पर मुख्यमंत्री, सांसद अनिल बलूनी ने भी एक बड़ी जनसभा को संबोधित कर लोगों से वोट की अपील की थी।श्रीनगर सीट पहले सामान्य सीट घोषित की गई थी। तब इस सीट पर तीन वर्षों से तैयारी कर रहे पार्टी से ही करीब छह से अधिक लोगों ने दावेदारी की थी। इन दावेदारों में भाजपा संगठन के जिला स्तरीय पदाधिकारी भी शामिल थे।
ऐन मौके पर सीट महिला होने से उनके सपने धरे रह गए। कुछ दावेदारों ने पुन: अपनी पत्नी के नाम पर दावेदारी की। लेकिन इस दौरान पार्टी में पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष विपिन चंद्र मैठाणी व उनकी बहन आशा उपाध्याय को शामिल किया गया। जिस पर पार्टी संगठन ने आशा उपाध्याय को मेयर का प्रत्याशी घोषित किया। इससे नाराज भाजपा के जिला उपाध्यक्ष (अब पार्टी से निष्कासित) लखपत सिंह भंडारी ने अपनी पत्नी आरती भंडारी को निर्दलीय चुनाव मैदान में खड़ा कर दिया। इससे पार्टी दो खेमों में बंट गई। हालांकि कैबिनेट मंत्री ने चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं को एकजुट करने को पूरी ताकत लगाई, लेकिन यह रणनीति काम नहीं आई।
-- -- -
पूरे चुनाव प्रचार में श्रीनगर में ही डटे रहे मंत्री
श्रीनगर। नगर निगम में मेयर व पार्षद पदों पर जीत दर्ज कराने के लिए कैबिनेट मंत्री डा. धन सिंह रावत पूरे चुनाव प्रचार के दौरान यहीं डटे रहे। उन्होंने मोहल्लों में बैठकें भी कराई। साथ ही प्रत्याशियों के साथ मोहल्लों में प्रचार में जाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। इस दौरान पार्टी ने श्रीनगर में हुए विकास कार्यों को गिनाते हुए भावी योजनाओं को भी जनता के समक्ष रखा। बावजूद 2018 में हुए नगर पालिका के चुनाव की तरह ही इस बार भी भाजपा की रणनीति धराशायी हो गई।
विज्ञापन
-- -
बेटियों की सुरक्षा का मुद्दा व हिंदू कार्ड से भंडारी बने नायक
श्रीनगर। नगर निगम श्रीनगर में बेटियों की सुरक्षा के मुद्दे व जयश्री राम के नारों से चले हिंदू कार्ड से लखपत भंडारी ने मेयर पद पर अपनी पत्नी की जीत दर्ज कराने में सफलता हासिल की। लगातार वह इसको लेकर मुहिम चलाते रहे, जिसे महिलाओं ने काफी सराहा। वहीं अपने भाषणों में लगातार इसका जिक्र करते रहे कि वह सनातनी हैं और असली भाजपा उनके साथ है। उन्होंने अपने भाषणों में भाजपा से दावेदारी कर रहे दावेदारों को टिकट न दिए जाने की बात भी प्रमुखता से उठाई, जिसने नाराज भाजपाइयों पर मरहम लगाने का काम किया। यह रणनीति उनकी काम आई और मेयर पद पर जीत हासिल हुई।
-- --
अपने ही वोट नहीं समेट पाई कांग्रेस
श्रीनगर। नगर निगम चुनाव श्रीनगर में कांग्रेस अपने ही कैडर वोट नहीं समेट पाई। पार्टी से लोकसभा चुनाव के दौरान निष्कासित पूनम तिवारी निर्दलीय तौर पर चुनाव मैदान में होने से पार्टी को इसका खामियाजा भी झेलना पड़ा। वहीं ऐन चुनाव के मौके पर वरिष्ठ कांग्रेस कार्यकर्ताओं के भाजपा में शामिल होने से भी पार्टी को नुकसान पहुंचा। हालांकि पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल व पूर्व कैबिनेट मंत्री डा. हरक सिंह रावत ने नगर में जनसंपर्क कर वोट जुटाने की कोशिश की, लेकिन इसमें उन्हें खास सफलता हाथ नहीं लग पाई।
ऐन मौके पर सीट महिला होने से उनके सपने धरे रह गए। कुछ दावेदारों ने पुन: अपनी पत्नी के नाम पर दावेदारी की। लेकिन इस दौरान पार्टी में पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष विपिन चंद्र मैठाणी व उनकी बहन आशा उपाध्याय को शामिल किया गया। जिस पर पार्टी संगठन ने आशा उपाध्याय को मेयर का प्रत्याशी घोषित किया। इससे नाराज भाजपा के जिला उपाध्यक्ष (अब पार्टी से निष्कासित) लखपत सिंह भंडारी ने अपनी पत्नी आरती भंडारी को निर्दलीय चुनाव मैदान में खड़ा कर दिया। इससे पार्टी दो खेमों में बंट गई। हालांकि कैबिनेट मंत्री ने चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं को एकजुट करने को पूरी ताकत लगाई, लेकिन यह रणनीति काम नहीं आई।
विज्ञापन
पूरे चुनाव प्रचार में श्रीनगर में ही डटे रहे मंत्री
श्रीनगर। नगर निगम में मेयर व पार्षद पदों पर जीत दर्ज कराने के लिए कैबिनेट मंत्री डा. धन सिंह रावत पूरे चुनाव प्रचार के दौरान यहीं डटे रहे। उन्होंने मोहल्लों में बैठकें भी कराई। साथ ही प्रत्याशियों के साथ मोहल्लों में प्रचार में जाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। इस दौरान पार्टी ने श्रीनगर में हुए विकास कार्यों को गिनाते हुए भावी योजनाओं को भी जनता के समक्ष रखा। बावजूद 2018 में हुए नगर पालिका के चुनाव की तरह ही इस बार भी भाजपा की रणनीति धराशायी हो गई।
विज्ञापन
बेटियों की सुरक्षा का मुद्दा व हिंदू कार्ड से भंडारी बने नायक
श्रीनगर। नगर निगम श्रीनगर में बेटियों की सुरक्षा के मुद्दे व जयश्री राम के नारों से चले हिंदू कार्ड से लखपत भंडारी ने मेयर पद पर अपनी पत्नी की जीत दर्ज कराने में सफलता हासिल की। लगातार वह इसको लेकर मुहिम चलाते रहे, जिसे महिलाओं ने काफी सराहा। वहीं अपने भाषणों में लगातार इसका जिक्र करते रहे कि वह सनातनी हैं और असली भाजपा उनके साथ है। उन्होंने अपने भाषणों में भाजपा से दावेदारी कर रहे दावेदारों को टिकट न दिए जाने की बात भी प्रमुखता से उठाई, जिसने नाराज भाजपाइयों पर मरहम लगाने का काम किया। यह रणनीति उनकी काम आई और मेयर पद पर जीत हासिल हुई।
अपने ही वोट नहीं समेट पाई कांग्रेस
श्रीनगर। नगर निगम चुनाव श्रीनगर में कांग्रेस अपने ही कैडर वोट नहीं समेट पाई। पार्टी से लोकसभा चुनाव के दौरान निष्कासित पूनम तिवारी निर्दलीय तौर पर चुनाव मैदान में होने से पार्टी को इसका खामियाजा भी झेलना पड़ा। वहीं ऐन चुनाव के मौके पर वरिष्ठ कांग्रेस कार्यकर्ताओं के भाजपा में शामिल होने से भी पार्टी को नुकसान पहुंचा। हालांकि पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल व पूर्व कैबिनेट मंत्री डा. हरक सिंह रावत ने नगर में जनसंपर्क कर वोट जुटाने की कोशिश की, लेकिन इसमें उन्हें खास सफलता हाथ नहीं लग पाई।