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गोरखा काल से जुड़ा है बूंखाल कालिका का इतिहास
Updated Fri, 01 Dec 2017 10:30 PM IST
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पाबौ/पौड़ी। बूंखाल कालिंका का प्रसिद्ध मेला शुक्रवार को लगेगा। मेले में राठ क्षेत्र के गांवों के सैकड़ों ग्रामीण देवी को आस्था के पुष्प अर्पित करते हैं। कभी यहां पशु बलि होती थी लेकिन अब सिर्फ सात्विक पूजा ही होती है। इस मेले का इतिहास गोरखाकाल से जुड़ा है।
किवदंती के अनुसार गाय चुगाते वक्त बच्चों ने शरारत में एक बालिका को खड्ड में दबा दिया। इसके बाद वे अपने घर चले गए, लेकिन बालिका वहीं दबी रह गई। रात्रि में वह गांव के प्रधान के सपने में जानकर घटना बताती है और कहती है कि उसने काली का रूप ले लिया है। उसका मंदिर निर्मित कर उनकी पूजा शुरू करो। काली का मंदिर बनने के बाद वह आवाज देकर लोगों को हर घटना की जानकारी देती थी। इस बीच, गोरखाओं ने आक्रमण किया तो वह गांव में पहुंचने से पहले आवाज देकर गोरखाओं की सूचना दे देती। गोरखाओं ने तंत्र से खड्ड में दबी देवी को उलटा कर दिया। तब से आवाज बंद हुई। कालिंका के इसी खड्ड में पहले सैकड़ों की तादाद में पशु बलि दी जाती थी और माना जाता था कि बलि के बाद देवी की कृपा प्राप्त होती है। वर्ष 2011 से पशुबलि बंद हो चुकी है। अब गांव ग्रामीण मेले के दिन ढोल-दमाऊ, निसाण और डोली लेकर मंदिर में सात्विक पूजा-अर्चना करते हैं।
एक कंपनी पीएसी और बड़ी तादाद में पुलिस का पहरा
मेले को देखते हुए पुलिस ने मंदिर और आसपास के क्षेत्र को छावनी में तब्दील कर दिया है। क्षेत्र में 129 पुलिस के अधिकारी और एक कंपनी पीएसी तैनात की गई है। मंदिर में पूर्व में पशुबलि होती थी, लेकिन अब यह पूर्ण रूप से बंद हो चुकी है। इसके अलावा, 12 जगहों पर चेक पोस्ट भी बनाए गए हैं। मुख्यालय करीब 44 किमी दूर तहसील चॉकीसैण में प्रसिद्ध बूंखाल कालिंका का मंदिर है। एसएसपी ने बताया कि सुरक्षा के लिहाज से खिर्सू , मेलसैण, पिठुण्डी, चोपड़ा, मलुण्ड, बद्री तिराह, पैठाणी, ओडली, बेला बाजार, मूसागली, पाबौ एवं मंदिर परिस में चेक पोस्ट बनाए गए हैं। सुरक्षा का प्रभार पुलिस उपाधीक्षक टिहरी हीरा सिंह रौथाण को सौंपा गया है। पुलिस अधीक्षक ने पुलिस टीम की बैठक ली और सख्त निर्देश दिए कि कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
किवदंती के अनुसार गाय चुगाते वक्त बच्चों ने शरारत में एक बालिका को खड्ड में दबा दिया। इसके बाद वे अपने घर चले गए, लेकिन बालिका वहीं दबी रह गई। रात्रि में वह गांव के प्रधान के सपने में जानकर घटना बताती है और कहती है कि उसने काली का रूप ले लिया है। उसका मंदिर निर्मित कर उनकी पूजा शुरू करो। काली का मंदिर बनने के बाद वह आवाज देकर लोगों को हर घटना की जानकारी देती थी। इस बीच, गोरखाओं ने आक्रमण किया तो वह गांव में पहुंचने से पहले आवाज देकर गोरखाओं की सूचना दे देती। गोरखाओं ने तंत्र से खड्ड में दबी देवी को उलटा कर दिया। तब से आवाज बंद हुई। कालिंका के इसी खड्ड में पहले सैकड़ों की तादाद में पशु बलि दी जाती थी और माना जाता था कि बलि के बाद देवी की कृपा प्राप्त होती है। वर्ष 2011 से पशुबलि बंद हो चुकी है। अब गांव ग्रामीण मेले के दिन ढोल-दमाऊ, निसाण और डोली लेकर मंदिर में सात्विक पूजा-अर्चना करते हैं।
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एक कंपनी पीएसी और बड़ी तादाद में पुलिस का पहरा
मेले को देखते हुए पुलिस ने मंदिर और आसपास के क्षेत्र को छावनी में तब्दील कर दिया है। क्षेत्र में 129 पुलिस के अधिकारी और एक कंपनी पीएसी तैनात की गई है। मंदिर में पूर्व में पशुबलि होती थी, लेकिन अब यह पूर्ण रूप से बंद हो चुकी है। इसके अलावा, 12 जगहों पर चेक पोस्ट भी बनाए गए हैं। मुख्यालय करीब 44 किमी दूर तहसील चॉकीसैण में प्रसिद्ध बूंखाल कालिंका का मंदिर है। एसएसपी ने बताया कि सुरक्षा के लिहाज से खिर्सू , मेलसैण, पिठुण्डी, चोपड़ा, मलुण्ड, बद्री तिराह, पैठाणी, ओडली, बेला बाजार, मूसागली, पाबौ एवं मंदिर परिस में चेक पोस्ट बनाए गए हैं। सुरक्षा का प्रभार पुलिस उपाधीक्षक टिहरी हीरा सिंह रौथाण को सौंपा गया है। पुलिस अधीक्षक ने पुलिस टीम की बैठक ली और सख्त निर्देश दिए कि कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
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