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श्रीनगर मेडिकल कॉलेज में टिक नहीं रहे डॅक्टर
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श्रीनगर।
राजकीय मेडिकल कॉलेज श्रीनगर में संकाय सदस्य/विशेषज्ञ चिकित्सक टिक नहीं रहे हैं। कॉलेज के मुख्य विभागों में धीरे-धीरे पद खाली होते जा रहे हैं। स्थिति यह है कि जैसे ही डॉक्टरों को मौका मिलता है, वह अन्यत्र ज्वाइन कर लेते हैं। नियमितीकरण, बेहतर सैलरी पैकेज, स्थायित्व और समयबद्ध प्रमोशन जैसे प्रमुख कारण हैं, जो कॉलेज की बदहाली की वजह बन रहे हैं।
11 साल से नियमितीकरण नहीं होने और अन्य प्रकरणों के निस्तारित नहीं होने से फैकल्टी संकाय सदस्य (फैकल्टी) मजबूरी में यहां से जा रहे हैं। वर्ष 2008-09 में जहां मेडिकल कॉलेज के प्रत्येक विभाग में लगभग पूरे पद भरे थे, वहीं आज स्थिति उलट हो गई है। वर्तमान में फैकल्टी की लगभग 40 फीसदी कमी हो गई है, जबकि वर्ष 2017 में फैकल्टी की 20 फीसदी कमी थी। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि संस्थान में कितनी तेजी से संकाय सदस्यों के पद रिक्त हो रहे हैं। यदि वक्त पर प्रदेश सरकार ने कदम नहीं उठाए, तो मरीजों और मेडिकल के छात्र-छात्राओं के लिए परेशानी खड़ी हो जाएगी। दिक्कत यह है कि हर दो साल में संकाय सदस्यों को अपने अनुबंध का नवीनीकरण कराना पड़ता है। यानी नए सिरे से नौकरी शुरू करनी पड़ती है, ऐसे में उनको स्थायित्व नहीं मिल पा रहा है।
अन्य राज्यों से कम मिल रहा वेतन
श्रीनगर। राजकीय मेडिकल कॉलेज श्रीनगर में संकाय सदस्यों को अन्य राज्यों में स्थित मेडिकल कॉलेजों की तुलना में कम वेतन मिल रहा है, जबकि उड़ीसा, अंडमान निकोबार और मिजोरम जैसे राज्य काफी अच्छा वेतन दे रहे हैं। पहाड़ में होने की वजह से श्रीनगर में भी वेतन में अतिरिक्त पैकेज की मांग की जाती रही है, लेकिन यहां न तो वेतन बढ़ रहा है और न ही नियमितीकरण हो रहा है।
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वेतन की तुलना (लाख रु.)
पद/राज्य उत्तराखंड मिजोरम उड़ीसा अंडमान
प्रोफेसर 1.75 2.50 2.70 2.30
एसो. प्रो 1.48 2.20 2.30 2.05
सहा. प्रो. 1.16 - - 1.80
सेना के हवाले करने के बयान ने भी पहुंचाया नुकसान
श्रीनगर। मेडिकल कॉलेज को सेना के हवाले की सरकार की घोषणा ने भी काफी नुकसान पहुंचाया है। वर्ष 2017 में भाजपा ने सत्ता में आते ही मेडिकल कॉलेज को सेना को देने की बात कर दी, जिसके बाद लंबे समय तक इंटरव्यू भी नहीं हुए। जब इंटरव्यू हुए, तो विशेषज्ञ चिकित्सक आने से कतराने लगे। क्योंकि उनको यह लगने लगा कि देर-सवेर कॉलेज को सेना ले लेगी। ऐसे में वह अधर में लटक जाएंगे।
कोट------------------
-सहायक प्रोफेसर पद पर नियमितीकरण की कार्रवाई चल रही है, जबकि रिक्त पदों के लिए शीघ्र इंटरव्यू होगा। शासन से पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए मैदान की तुलना में 30 फीसदी अधिक वेतन देने का अनुरोध किया गया है, ताकि डॉक्टर टिक सके।
- प्रो. सीएम रावत, प्राचार्य, राजकीय मेडिकल कॉलेज, श्रीनगर
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राजकीय मेडिकल कॉलेज श्रीनगर में संकाय सदस्य/विशेषज्ञ चिकित्सक टिक नहीं रहे हैं। कॉलेज के मुख्य विभागों में धीरे-धीरे पद खाली होते जा रहे हैं। स्थिति यह है कि जैसे ही डॉक्टरों को मौका मिलता है, वह अन्यत्र ज्वाइन कर लेते हैं। नियमितीकरण, बेहतर सैलरी पैकेज, स्थायित्व और समयबद्ध प्रमोशन जैसे प्रमुख कारण हैं, जो कॉलेज की बदहाली की वजह बन रहे हैं।
11 साल से नियमितीकरण नहीं होने और अन्य प्रकरणों के निस्तारित नहीं होने से फैकल्टी संकाय सदस्य (फैकल्टी) मजबूरी में यहां से जा रहे हैं। वर्ष 2008-09 में जहां मेडिकल कॉलेज के प्रत्येक विभाग में लगभग पूरे पद भरे थे, वहीं आज स्थिति उलट हो गई है। वर्तमान में फैकल्टी की लगभग 40 फीसदी कमी हो गई है, जबकि वर्ष 2017 में फैकल्टी की 20 फीसदी कमी थी। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि संस्थान में कितनी तेजी से संकाय सदस्यों के पद रिक्त हो रहे हैं। यदि वक्त पर प्रदेश सरकार ने कदम नहीं उठाए, तो मरीजों और मेडिकल के छात्र-छात्राओं के लिए परेशानी खड़ी हो जाएगी। दिक्कत यह है कि हर दो साल में संकाय सदस्यों को अपने अनुबंध का नवीनीकरण कराना पड़ता है। यानी नए सिरे से नौकरी शुरू करनी पड़ती है, ऐसे में उनको स्थायित्व नहीं मिल पा रहा है।
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अन्य राज्यों से कम मिल रहा वेतन
श्रीनगर। राजकीय मेडिकल कॉलेज श्रीनगर में संकाय सदस्यों को अन्य राज्यों में स्थित मेडिकल कॉलेजों की तुलना में कम वेतन मिल रहा है, जबकि उड़ीसा, अंडमान निकोबार और मिजोरम जैसे राज्य काफी अच्छा वेतन दे रहे हैं। पहाड़ में होने की वजह से श्रीनगर में भी वेतन में अतिरिक्त पैकेज की मांग की जाती रही है, लेकिन यहां न तो वेतन बढ़ रहा है और न ही नियमितीकरण हो रहा है।
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वेतन की तुलना (लाख रु.)
पद/राज्य उत्तराखंड मिजोरम उड़ीसा अंडमान
प्रोफेसर 1.75 2.50 2.70 2.30
एसो. प्रो 1.48 2.20 2.30 2.05
सहा. प्रो. 1.16 - - 1.80
सेना के हवाले करने के बयान ने भी पहुंचाया नुकसान
श्रीनगर। मेडिकल कॉलेज को सेना के हवाले की सरकार की घोषणा ने भी काफी नुकसान पहुंचाया है। वर्ष 2017 में भाजपा ने सत्ता में आते ही मेडिकल कॉलेज को सेना को देने की बात कर दी, जिसके बाद लंबे समय तक इंटरव्यू भी नहीं हुए। जब इंटरव्यू हुए, तो विशेषज्ञ चिकित्सक आने से कतराने लगे। क्योंकि उनको यह लगने लगा कि देर-सवेर कॉलेज को सेना ले लेगी। ऐसे में वह अधर में लटक जाएंगे।
कोट------------------
-सहायक प्रोफेसर पद पर नियमितीकरण की कार्रवाई चल रही है, जबकि रिक्त पदों के लिए शीघ्र इंटरव्यू होगा। शासन से पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए मैदान की तुलना में 30 फीसदी अधिक वेतन देने का अनुरोध किया गया है, ताकि डॉक्टर टिक सके।
- प्रो. सीएम रावत, प्राचार्य, राजकीय मेडिकल कॉलेज, श्रीनगर