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जर्जर पेयजल योजना से कैसे बुझेगी ग्रामीणों की प्यास
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श्रीनगर। विकासखंड कीर्तिनगर व देवप्रयाग की करीब 12 से अधिक सामूहिक पेयजल योजनाएं अत्यधिक जर्जर हो चुकी हैं। जिस कारण तीन दशक पूर्व बनी योजनाएं ग्रामीणों की प्यास बुझाने में नाकाम हो रही है। परिणाम स्वरूप ग्रामीण प्राकृतिक जलस्रोत व हैंड पंपों से पानी ढो रहे हैं।
विकासखंड देवप्रयाग के करीब 200 गांवों के लिए 1983-84 में बनी बागवान-हिंडोलाखाल पंपिंग पेयजल योजना का आज तक पुनर्गठन नहीं हो पाया है। अत्यधिक जर्जर हो चुकी योजना की पाइप लाइन फटने, पंपों में खराबी आने से क्षेत्र में नियमित आपूर्ति नहीं हो पा रही है, जिस कारण ग्रामीणों को आए दिन पेयजल समस्या से जूझना पड़ रहा है। यही स्थिति क्षेत्र की खरसाड़ी व महड़ कांडा पेयजल योजनाओं की है। ग्रामीणों को आज भी प्राकृतिक जलस्रोत व हैंडपंपों पर अधिक निर्भर रहना पड़ रहा है। दूसरी ओर विकासखंड कीर्तिनगर के चौकी, थातीडागर, मलेथा, मोलधार, जाखी-गवाणा, डांग-मूलाणा, चाचकंडा, रणकंडियाल, न्यूली, पंयाकोटी, डांडा, डांगचौरा व जाखणी के लिए 30 से 35 वर्ष पूर्व बनी सामूहिक पेयजल योजनाओं की है। भले ही इन योजनाओं से जुड़े कुछ गांव कोटेश्वर-सिल्काखाल व अकरी बारजूला पंपिंग पेयजल योजना से जुड़ चुके है, लेकिन अधिकतर गांव आज भी इन जर्जर योजनाओं के भरोसे है। जल संस्थान के सहायक अभियंता गिरीश भट्ट ने बताया कि योजना का 20 से 25 साल में पुनर्गठन का प्रावधान है। क्षेत्र की उक्त सभी योजनाएं अत्यधिक जर्जर हो चुकी है। साथ ही अधिकतर योजनाएं मोटर मार्ग निर्माण के मलबे से भी क्षतिग्रस्त है, जिससे ग्रामीणों को आवश्यकता के अनुरूप पानी नही मिल पा रहा है। योजना के पुनर्गठन के लिए किसी भी गांव से प्रस्ताव नहीं भेजा गया है। अगर प्रस्ताव आए तो उन्हें शीघ्र ही अग्रसारित किया जाएगा। दूसरी ओर पेयजल निगम देवप्रयाग के अधिशासी अभियंता आरएस बिष्ट ने बताया कि बागवान-हिंडोलाखाल पंपिंग पेयजल योजना का पुनर्गठन के तहत ट्रीटमेंट प्लांट, पंप बदलने व मुख्य पाइप लाइन बिछाने के लिए निविदा हो चुकी है। आचार संहिता के बाद कार्य शुरू किया जाएगा।
कीर्तिनगर के इन गांवों में हैं सबसे अधिक पेयजल समस्या
विकास खंड के मुलाणा, डांग, ठगरोजा, कपरोली, कोठार, रणकंडियाल, जाखणी, घिल्डियालगांव, देवली, डांगचौरा, बडोला, मुसाणगांव, बडोन, बिनाणी, देवली, घरगांव, पठवाड़ा, पांव अकरी आदि सहित चौरास क्षेत्र की आठ ग्राम पंचायतों में सबसे अधिक पेयजल समस्या है। इन गांवों के ग्रामीणों को गर्मियों में आए दिन प्राकृतिक जलस्रोत, हैंडपंप व अन्य माध्यमों से पानी ढोकर प्यास बुझानी पड़ती है।
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जारी
धनवीर
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विकासखंड देवप्रयाग के करीब 200 गांवों के लिए 1983-84 में बनी बागवान-हिंडोलाखाल पंपिंग पेयजल योजना का आज तक पुनर्गठन नहीं हो पाया है। अत्यधिक जर्जर हो चुकी योजना की पाइप लाइन फटने, पंपों में खराबी आने से क्षेत्र में नियमित आपूर्ति नहीं हो पा रही है, जिस कारण ग्रामीणों को आए दिन पेयजल समस्या से जूझना पड़ रहा है। यही स्थिति क्षेत्र की खरसाड़ी व महड़ कांडा पेयजल योजनाओं की है। ग्रामीणों को आज भी प्राकृतिक जलस्रोत व हैंडपंपों पर अधिक निर्भर रहना पड़ रहा है। दूसरी ओर विकासखंड कीर्तिनगर के चौकी, थातीडागर, मलेथा, मोलधार, जाखी-गवाणा, डांग-मूलाणा, चाचकंडा, रणकंडियाल, न्यूली, पंयाकोटी, डांडा, डांगचौरा व जाखणी के लिए 30 से 35 वर्ष पूर्व बनी सामूहिक पेयजल योजनाओं की है। भले ही इन योजनाओं से जुड़े कुछ गांव कोटेश्वर-सिल्काखाल व अकरी बारजूला पंपिंग पेयजल योजना से जुड़ चुके है, लेकिन अधिकतर गांव आज भी इन जर्जर योजनाओं के भरोसे है। जल संस्थान के सहायक अभियंता गिरीश भट्ट ने बताया कि योजना का 20 से 25 साल में पुनर्गठन का प्रावधान है। क्षेत्र की उक्त सभी योजनाएं अत्यधिक जर्जर हो चुकी है। साथ ही अधिकतर योजनाएं मोटर मार्ग निर्माण के मलबे से भी क्षतिग्रस्त है, जिससे ग्रामीणों को आवश्यकता के अनुरूप पानी नही मिल पा रहा है। योजना के पुनर्गठन के लिए किसी भी गांव से प्रस्ताव नहीं भेजा गया है। अगर प्रस्ताव आए तो उन्हें शीघ्र ही अग्रसारित किया जाएगा। दूसरी ओर पेयजल निगम देवप्रयाग के अधिशासी अभियंता आरएस बिष्ट ने बताया कि बागवान-हिंडोलाखाल पंपिंग पेयजल योजना का पुनर्गठन के तहत ट्रीटमेंट प्लांट, पंप बदलने व मुख्य पाइप लाइन बिछाने के लिए निविदा हो चुकी है। आचार संहिता के बाद कार्य शुरू किया जाएगा।
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कीर्तिनगर के इन गांवों में हैं सबसे अधिक पेयजल समस्या
विकास खंड के मुलाणा, डांग, ठगरोजा, कपरोली, कोठार, रणकंडियाल, जाखणी, घिल्डियालगांव, देवली, डांगचौरा, बडोला, मुसाणगांव, बडोन, बिनाणी, देवली, घरगांव, पठवाड़ा, पांव अकरी आदि सहित चौरास क्षेत्र की आठ ग्राम पंचायतों में सबसे अधिक पेयजल समस्या है। इन गांवों के ग्रामीणों को गर्मियों में आए दिन प्राकृतिक जलस्रोत, हैंडपंप व अन्य माध्यमों से पानी ढोकर प्यास बुझानी पड़ती है।
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