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पहाड़ी फिल्मों से शुल्क और बॉलीवुड की शूटिंग निशुल्क
Updated Mon, 15 Oct 2018 10:40 PM IST
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पौड़ी। पहाड़ी फिल्मों की पहाड़ में शूटिंग पर शुल्क और बॉलीवुड की शूटिंग निशुल्क हो रही है। यह कहना है भुली ए भुली, सुबेरो घाम और मेजर निराला सहित कई गढ़वाली फिल्मों के निर्देशक गणेश विरान का। विरान ने कहा कि पहाड़ में फिल्म उद्योग और पहाड़ी फिल्मों को बढ़ावा दिए जाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि पहाड़ी फिल्मों के प्रोत्साहन के लिए कोई नीति नहीं बन पाई है।
मंडल मुख्यालय पौड़ी में अमर उजाला से बातचीत में गणेश विरान ने कहा कि गढ़वाली, कुमाऊंनी फिल्मों की पहाड़ी वन क्षेत्रों में शूटिंग न तो निशुल्क है और न ही इन फिल्मों के बनने के बाद इन्हें थियेटर मिल पा रहे हैं। स्थानीय डाक्यूमेंट्री फिल्मों के लिए प्रतिदिन 30 हजार और फीचर फिल्मों की शूटिंग के लिए 90 हजार रुपये शुल्क लिया जा रहा है, जबकि बॉलीवुड फिल्मों के लिए यह निशुल्क है। शूटिंग के दौरान सरकारी भवनों में रुकने के लिए भी कोई छूट नहीं है। यदि स्थानीय निर्माता, निर्देशकों ने किसी तरह फिल्म बना भी ली तो इन फिल्मों को प्रदेश में थियेटर नहीं मिल पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र की तर्ज पर उत्तराखंड में भी यह कानून बनाया जाना चाहिए कि सिनेमा हॉल मालिक प्रतिदिन एक से दो शो स्थानीय फिल्मों के लगाएं।
हिमाचली फिल्मों पर कर रहे हैं काम
गणेश ने बताया कि उन्होंने 1997 में सबसे पहले वीडियो एलबम झुम्पा बनाया। इन दिनों वह हिमाचल के रीति रिवाजों पर आधारित फिल्म बनाने जा रहे हैं। बड़े पर्दे की इस हिमाचली फिल्म से हिमाचली संस्कृति को पहचान मिलेगी। इस फिल्म के लिए लोकेशन फाइनल किए जाने के बाद मार्च से पहले इसकी शूटिंग शुरू हो जाएगी। जो एक से डेढ़ साल के भीतर दर्शकों के बीच होगी।
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मंडल मुख्यालय पौड़ी में अमर उजाला से बातचीत में गणेश विरान ने कहा कि गढ़वाली, कुमाऊंनी फिल्मों की पहाड़ी वन क्षेत्रों में शूटिंग न तो निशुल्क है और न ही इन फिल्मों के बनने के बाद इन्हें थियेटर मिल पा रहे हैं। स्थानीय डाक्यूमेंट्री फिल्मों के लिए प्रतिदिन 30 हजार और फीचर फिल्मों की शूटिंग के लिए 90 हजार रुपये शुल्क लिया जा रहा है, जबकि बॉलीवुड फिल्मों के लिए यह निशुल्क है। शूटिंग के दौरान सरकारी भवनों में रुकने के लिए भी कोई छूट नहीं है। यदि स्थानीय निर्माता, निर्देशकों ने किसी तरह फिल्म बना भी ली तो इन फिल्मों को प्रदेश में थियेटर नहीं मिल पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र की तर्ज पर उत्तराखंड में भी यह कानून बनाया जाना चाहिए कि सिनेमा हॉल मालिक प्रतिदिन एक से दो शो स्थानीय फिल्मों के लगाएं।
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हिमाचली फिल्मों पर कर रहे हैं काम
गणेश ने बताया कि उन्होंने 1997 में सबसे पहले वीडियो एलबम झुम्पा बनाया। इन दिनों वह हिमाचल के रीति रिवाजों पर आधारित फिल्म बनाने जा रहे हैं। बड़े पर्दे की इस हिमाचली फिल्म से हिमाचली संस्कृति को पहचान मिलेगी। इस फिल्म के लिए लोकेशन फाइनल किए जाने के बाद मार्च से पहले इसकी शूटिंग शुरू हो जाएगी। जो एक से डेढ़ साल के भीतर दर्शकों के बीच होगी।
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