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ताकि अपनों पर दूसरा रंग न चढ़े

Mon, 21 Mar 2016 01:19 AM IST
अनूप वाजपेयी, हल्द्वानी।
अनूप वाजपेयी, हल्द्वानी। Updated Mon, 21 Mar 2016 01:19 AM IST
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Went on his own, not the other color
राज्य की राजनीति - फोटो : अमर उजाला
 उत्तराखंड के विधायकों पर किसी और का रंग न चढ़े, लिहाजा उन्हें इस बार होली के शोरगुल और रंगों से अलग रहना होगा। विधायकों की होली इस बार घर-परिवार और समर्थकों से दूर आलीशान होटल और रिजोर्ट के बंद कमरों में होगी। होली में दिल मिल जाते हैं और दुश्मन भी गले लगते हैं, लेकिन इस होली से पहले अपने भी गले लगने को तैयार नहीं है। राज्य की राजनीति में दुश्मनी का जो चटख रंग घोला गया है, वह होली के बाद ही उतरेगा। 28 मार्च को विधानसभा के अंदर पता चलेगा कि किसकी पिचकारी में कितना और कौन-कौन से रंग हैं।
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होली के पहले राज्य में चल रहे राजनीतिक हुड़दंग में पाले तो खिंच गए हैं, लेकिन दोनों ओर अपनों के विश्वास का रंग फीका पड़ गया है। कांग्रेस की चिंता तो समझ में आती है कि उनके नौ विधायक खुलेआम सदन के अंदर विपक्ष के साथ जा बैठे और विरोध में हाथ खड़े किए। लेकिन विपक्ष में बैठी भाजपा ने भी 18 मार्च से पहले अपने विधायकों को एक जगह जुटा लिया था। भाजपा को जितना डर उस पाले से आए विधायकों के लौट जाने का है। वहीं कहीं न कहीं अपनी गिनती भी पूरी रखने का था। राज्यपाल की परेड के बाद भाजपा विधायक भी छोड़े नहीं गए हैं उन्हें भी सुरक्षा के कवच में गुड़गांव के होटल में रहना पड़ रहा है।
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कांग्रेस का डर स्वाभाविक है, लिहाजा बचे विधायकों को समेट कर रामनगर पहुंचा दिया। कांग्रेस को कुमाऊं कहीं न कहीं अधिक सुरक्षित दिख रहा है। जिस समय हरीश रावत की ताजपोशी मुख्यमंत्री के लिए होनी थी उस समय गिनती गिनाने के नाम पर कुमाऊं के आधा दर्जन विधायक उनके साथ खड़े थे। रामनगर में भी उन्हीं विधायकों की निगरानी में विश्वास की गिनती पूरी रखी जा रही है। 
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उत्तराखंड में लगातार खंडित जनादेश के बाद भी सरकारें दूसरों के विश्वास के रंग पर तो जमी रहीं, लेकिन 15 साल की आयु वाले इस राज्य में पहली बार विश्वास का संकट है। 2002 खंडित जनादेश पाने वाले एनडी तिवारी ने पांच साल सरकार दूसरे के विश्वास पर ही चलाई। लाख विरोध के बाद भी कांग्रेस विधायकों पर दूसरा कोई रंग नहीं चढ़ा। 2007 में भाजपा स्पष्ट बहुमत से दूर रही, लेकिन सरकार चली। नेतृत्व बदला, फिर भी दलीय विश्वास बदरंग नहीं हुआ।


राज्य की जनता के सामने भी मुश्किल खड़ी है। जनता कुछ माह बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में अपना फैसला सुनाने जा रही थी पर इससे पहले ही राजनेताओं के चहेरों पर जो रंग चढ़ा है उससे असलियत छुप गई है।
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