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Swami Vivekananda: स्वामी विवेकानंद दो बार आए थे अल्मोड़ा, इस जगह की थी साधना; पढ़ाया था भाईचारे का पाठ
Fri, 12 Jan 2024 01:38 PM IST
हीरा मेहरा
अमर उजाला नेटवर्क, अल्मोड़ा
अमर उजाला नेटवर्क, अल्मोड़ा
Published by: हीरा मेहरा
Updated Fri, 12 Jan 2024 01:38 PM IST
सार
उत्तराखंड के अल्मोड़ा से स्वामी विवेकानंद का गहरा लगाव था। अल्मोड़ा नगर के लोगों ने स्वामी विवेकानंद की दो बार मेहमाननवाजी की है। स्वामी विवेकानंद दो बार 1890 और 1897 में अल्मोड़ा आए थे।
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अल्मोड़ा के इस मकान में रुके थे स्वामी विवेकानंद
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
अल्मोड़ा नगर के लोगों ने दो बार स्वामी विवेकानंद की मेहमाननवाजी की है। स्वामी विवेकानंद दो बार 1890 और 1897 में अल्मोड़ा आए थे। उन्होंने यहां साधना की थी। 11 मई 1897 को उन्होंने खजांची बाजार में जन समूह को उपदेश देकर भाईचारे का पाठ पढ़ाया था।
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उत्तराखंड के संबंध में तब उन्होंने कहा था कि यह वही भूमि है जहां निवास करने की कल्पना मैं अपने बाल्यकाल से ही कर रहा हूं। इन पहाड़ों के साथ कई श्रेष्ठतम स्मृतियां जुड़ीं हैं। यदि धार्मिक भारत के इतिहास से हिमालय को निकाल दिया जाए तो उसका अत्यल्प ही बचा रहेगा। इसलिए यहां एक केंद्र अवश्य होना चाहिए। दो अगस्त 1897 में स्वामी विवेकानंद मैदान की तरफ लौट गए। वह खजांची मोहल्ला स्थिति स्व बद्री शाह के मेहमान बने थे। इस मकान में उनके निवास करने संबंधित पट्टिका भी लगी है। उनके मन में हिमालय में एक केंद्र स्थापित करने का विचार था।
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काकड़ीघाट में हुई थी ज्ञान की प्राप्ति
अल्मोड़ा में अगस्त 1890 में स्वामी विवेकानंद हिमालय यात्रा कर रहे थे। नैनीताल की यात्रा कर विवेकानंद और स्वामी अखंडानंद पैदल अल्मोड़ा रवाना हुए। काकड़ीघाट में पीपल के पेड़ के नीचे विवेकानंद ने तपस्या की और उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। यहां से दोनों अल्मोड़ा को रवाना हुए। भूखे प्यासे और पैदल चलने से थकान के कारण करबला कब्रिस्तान के पास वह अचेत हो गए। इस दौरान वहां एक फकीर पहुंचा और उसने उन्हें खीरा खिलाया, जिससे उनकी चेतना जागृत हो गई। जिस पत्थर पर स्वामी विवेकानंद बेहोश हुए थे वहां आज उनका स्मारक बना है।
अल्मोड़ा में अगस्त 1890 में स्वामी विवेकानंद हिमालय यात्रा कर रहे थे। नैनीताल की यात्रा कर विवेकानंद और स्वामी अखंडानंद पैदल अल्मोड़ा रवाना हुए। काकड़ीघाट में पीपल के पेड़ के नीचे विवेकानंद ने तपस्या की और उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। यहां से दोनों अल्मोड़ा को रवाना हुए। भूखे प्यासे और पैदल चलने से थकान के कारण करबला कब्रिस्तान के पास वह अचेत हो गए। इस दौरान वहां एक फकीर पहुंचा और उसने उन्हें खीरा खिलाया, जिससे उनकी चेतना जागृत हो गई। जिस पत्थर पर स्वामी विवेकानंद बेहोश हुए थे वहां आज उनका स्मारक बना है।