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समाज को साहित्य से दूर करने की कोशिश चिंतनीय: मंगलेश
अमर उजाला ब्यूरो भीमताल
Updated Tue, 30 Aug 2016 11:58 PM IST
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सम्मेलन को संबोधित करते वरिष्ठ साहित्यकार मंगलेश डबराल
- फोटो : अमर उजाला
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साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार मंगलेश डबराल का कहना है कि मौजूदा समय में मुख्यधारा के हिंदी साहित्य में निराशा जैसी स्थिति है। कहा कि वर्तमान में समाज को साहित्य से दूर करने की कोशिशें हो रही हैं। जो कि चिंता का विषय है।
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डबराल रामगढ़ ब्लॉक की उमागढ़ ग्रामसभा स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ में आयोजित दो दिवसीय उत्तराखंड का साहित्यिक परिदृश्य : संभावनाएं और चुनौतियां विषयक सम्मेलन के उद्घाटन पर संबोधित कर रहे थे।
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वर्तमान दौर को विचारधारा के अंत का समय बताते हुए उन्होंने कहा कि जो रचनाएं लिखी भी जा रही हैं वह बड़े सपनों से रहित हैं। कहा कि हमें इन विसंगतियों के बीच से ही रास्ता तलाशना है। उन्होंने कहा कि आज ऐसी रचना लिखने की चुनौती है जो खुद को पढ़वा सके।
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उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में पत्रकारिता और जनसंचार विभाग के अध्यक्ष प्रो. गोविंद सिंह ने कहा कि साहित्यकारों के समक्ष यथार्थ को समझने और पाठकों को समझाने की बड़ी चुनौती है। रचनाएं बाजार के दबाव में लिखी जा रही हैं।
पुरस्कार पाने की आपाधापी में साहित्यकार ही नहीं बल्कि निर्णायक भी अविश्वसनीय हो गए हैं। सामाजिक मूल्यों के बजाए बाजारवाद, भूमंडलीकरण, आतंकवाद और सांप्रदायिकता जैसे विषय रचनाओं के केंद्र में आ गए हैं।
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ के विभागाध्यक्ष प्रो.नवीन चंद्र लोहनी, कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुमाऊंनी भाषा विभाग के संयोजक प्रो. शेर सिंह बिष्ट, कुविवि की हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. नीरजा टंडन आदि ने भी सम्मेलन को संबोधित किया।
द्वितीय सत्र में हिंदी रचनाशीलता एवं नए समाज की चुनौतियां विषय पर समकालीन लेखन से जुड़े विभिन्न घटकों पर चर्चा हुई। इस चर्चा में प्रो. दिवा भट्ट, राजेश सकलानी, डॉ. शंभू दत्त पांडे शैलेय, डॉ. मन्नू ढौडियाल, डॉ. हयात सिंह रावत आदि ने हिस्सा लिया।
इससे पूर्व अतिथियों ने महादेवी वर्मा के चित्र पर माल्यापर्ण कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस दौरान पीठ के निदेशक प्रो. देव सिंह पोखरिया, विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे साहित्यकार आदि थे। संचालन शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत ने किया।