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Nainital News: बजती थी जो हर चौपाल में, वह ढोलक अब होने को है खामोश
Mon, 03 Mar 2025 01:34 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, नैनीताल
संवाद न्यूज एजेंसी, नैनीताल
Updated Mon, 03 Mar 2025 01:34 AM IST
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भूपेश कन्नौजिया
हल्द्वानी। होली सिर्फ रंगों का नहीं, बल्कि संगीत, उत्साह और लोक संस्कृति का भी त्योहार है। ढोलक की थाप के बिना होली का फाग, चौपालों की बैठकी और हंसी-ठिठोली अधूरी मानी जाती है, लेकिन अब उत्सवों की धड़कन ढोलक गुम होने को है। पहाड़ के सुदूर अंचलों में भी अब ढोलक की थाप की जगह डीजे ने ले ली है।
करीब दो हजार की आबादी वाली हल्द्वानी की ढोलक बस्ती में 1200 लोग ढोलक बनाने का काम करते हैं। इसी वजह से इस बस्ती का नाम ढोलक बस्ती पड़ा। ये लोग फेरी लगाकर शहर सहित पूरे कुमाऊं में ढोलक बेचने जाते हैं। होली आने वाली है और इनके चेहरे उतरे हुए हैं, बस्ती से रौनक गुम है, क्योंकि ढोलक निर्माण का काम मंदा है। संवाद
नए तरीके भी अपनाए पर नहीं मिला फायदा
कारीगरों ने बताया कि नई तकनीक अपनाते हुए पेंच वाली ढोलक भी बना रहे हैं जो काफी आकर्षक है। इसमें उम्दा चमड़ा लगाया जाता है। इसके बाद भी खरीदार ढूंढे नहीं मिल रहे। यहां एक हजार से 20 हजार रुपये तक की ढोलक है।
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अमरोहा से आता है ढोलक बनाने का कच्चा माल
ढोलक बनाने का कच्चा माल यूपी के अमरोहा से लाया जाता है। इनमें शीशम, आम, सागौन, बबूल की लकड़ी और चमड़ा लगाया जाता है। पहले की अपेक्षा सामान महंगा हो गया है जिससे लागत बढ़ गई है।
व्यथा
1- पहले होली पर करीब दो हजार ढोलक बिकती थीं लेकिन अब केवल दो सौ तक ही बेच पाते हैं। अब तो पहाड़ों में कोई मरम्मत भी नहीं करवाता। - मोहर अली, ढोलक बस्ती निवासी कारीगर।
2- दादा-परदादा के समय से हमारा यही काम रहा है। लगता है कुछ और काम ढूंढना होगा, क्योंकि अब इससे दो वक्त की रोटी मिलना संभव नहीं है। पिछले तीन माह में केवल आठ ढोलकों की मरम्मत की है। - रोहित, कारीगर
3- हम यहां के वोटर हैं। कभी किसी नेता, सांसद ने कोई सुध नहीं ली कि हमारे इस धंधे के लिए कोई अनुदान या सहायता राशि दे, ताकि अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें। - महिपाल, कारीगर
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हल्द्वानी। होली सिर्फ रंगों का नहीं, बल्कि संगीत, उत्साह और लोक संस्कृति का भी त्योहार है। ढोलक की थाप के बिना होली का फाग, चौपालों की बैठकी और हंसी-ठिठोली अधूरी मानी जाती है, लेकिन अब उत्सवों की धड़कन ढोलक गुम होने को है। पहाड़ के सुदूर अंचलों में भी अब ढोलक की थाप की जगह डीजे ने ले ली है।
करीब दो हजार की आबादी वाली हल्द्वानी की ढोलक बस्ती में 1200 लोग ढोलक बनाने का काम करते हैं। इसी वजह से इस बस्ती का नाम ढोलक बस्ती पड़ा। ये लोग फेरी लगाकर शहर सहित पूरे कुमाऊं में ढोलक बेचने जाते हैं। होली आने वाली है और इनके चेहरे उतरे हुए हैं, बस्ती से रौनक गुम है, क्योंकि ढोलक निर्माण का काम मंदा है। संवाद
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नए तरीके भी अपनाए पर नहीं मिला फायदा
कारीगरों ने बताया कि नई तकनीक अपनाते हुए पेंच वाली ढोलक भी बना रहे हैं जो काफी आकर्षक है। इसमें उम्दा चमड़ा लगाया जाता है। इसके बाद भी खरीदार ढूंढे नहीं मिल रहे। यहां एक हजार से 20 हजार रुपये तक की ढोलक है।
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अमरोहा से आता है ढोलक बनाने का कच्चा माल
ढोलक बनाने का कच्चा माल यूपी के अमरोहा से लाया जाता है। इनमें शीशम, आम, सागौन, बबूल की लकड़ी और चमड़ा लगाया जाता है। पहले की अपेक्षा सामान महंगा हो गया है जिससे लागत बढ़ गई है।
व्यथा
1- पहले होली पर करीब दो हजार ढोलक बिकती थीं लेकिन अब केवल दो सौ तक ही बेच पाते हैं। अब तो पहाड़ों में कोई मरम्मत भी नहीं करवाता। - मोहर अली, ढोलक बस्ती निवासी कारीगर।
2- दादा-परदादा के समय से हमारा यही काम रहा है। लगता है कुछ और काम ढूंढना होगा, क्योंकि अब इससे दो वक्त की रोटी मिलना संभव नहीं है। पिछले तीन माह में केवल आठ ढोलकों की मरम्मत की है। - रोहित, कारीगर
3- हम यहां के वोटर हैं। कभी किसी नेता, सांसद ने कोई सुध नहीं ली कि हमारे इस धंधे के लिए कोई अनुदान या सहायता राशि दे, ताकि अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें। - महिपाल, कारीगर