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अपने आप में इतिहास को समेटे हैं नैनीताल के कब्रिस्तान
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नैनीताल में पाइंस स्थित कब्रिस्तान में अंग्रेजों के जमाने की कब्र। संवाद न्यूज एजेंसी
- फोटो : NAINITAL
नैनीताल। कब्रिस्तान एक ऐसा नाम है जिसे न तो लोग सुनना पसंद करते हैं और न ही यहां जाना चाहते हैं लेकिन ऐसे स्थान भी अपने में इतिहास समेटे हुए हों तो धरोहर बन जाते हैं। नैनीताल के कब्रिस्तान भी इनमें एक हैं जहां प्रसिद्ध शिकारी जिम कार्बेट के माता-पिता के अलावा अफ्रीका के बोअर वार के कैदियों, अंग्रेजों के जमाने के प्रसिद्ध पोलो खिलाड़ी, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की भक्त रहीं डिवाइन पेंटर ऑफ हंगरी समेत उनकी बेटी भी यहां दफन हैं। अब जिला प्रशासन यहां पाइंस स्थित कब्रिस्तान को हैरिटेज बनाने के लिए काम कर रहा है।
प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. अजय रावत बताते हैं कि वर्ष 1841 में नैनीताल में बसासत शुरू हो चुकी थी। तब वर्ष 1842 में आयारपाटा क्षेत्र में पहला कब्रिस्तान अस्तित्व में आया। यह वही क्षेत्र है जहां जिम कार्बेट का घर गनी हाउस है। वर्ष 1892 में इस कब्रिस्तान को बंद कर दिया गया। इसके बाद सूखाताल क्षेत्र में वर्ष 1845 में कब्रिस्तान बनाया गया जिसे 1890 के बाद बंद कर दिया गया। हालांकि आजादी के बाद इसे खोल दिया गया और वर्ष 1955 तक यह कब्रिस्तान अस्तित्व में रहा। इसी कब्रिस्तान में जिम कार्बेट के पिता क्रिस्टोफर विलियम कार्बेट और मां मैरी जेन कार्बेट की कब्रें हैं। नैनीताल का नगरीकरण कराने वाले तत्कालीन कमिश्नर जार्ज थामस ल्यूसिंगटन की कब्र भी यहीं है। प्रो. रावत के अनुसार प्रसिद्ध चित्रकार एलिजाबेथ सैस ब्रूनर और उनकी बेटी एलिजाबेथ ब्रूनर भी सूखाताल कब्रिस्तान में ही दफन हैं। एलिजाबेथ ब्रूनर ने महात्मा गांधी की पोट्रेट बनाई थी। ये दोनों मां-बेटी महात्मा गांधी के भक्त थे। उन्हें डिवाइन पेंटर आफ हंगरी के नाम से भी जाना जाता था। वर्ष 1942 में अंग्रेजों ने इन्हें भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लेने के आरोप में नैनीताल में ही नजरबंद कर दिया था।
सड़ियाताल में वर्ष 1892 में कब्रिस्तान बनाया गया। इसे सिविल पब्लिक के लिए बनाया गया था। प्रो. रावत के अनुसार वर्ष 1895 में पाइंस में स्थापित कब्रिस्तान विशेष रूप से अंग्रेज अफसरों के लिए था। इस कब्रिस्तान में द्वितीय विश्व युद्ध के मेजर आरसी बडन समेत वर्ष 1899 से 1902 तक चले अफ्रीका के बोअर वार के कई ऐसे सैन्य अधिकारियों (बंदियों) की भी कब्रें हैं जिन्हें भीमताल स्थित आड़ू के मैदान में रखा गया था और वहां उनकी मौत हो गई थी। इनमें मेजर जनरल वाइस, कर्नल कमांडेंट न्यूजेंट, मेजर रोजडी, कैप्टन ओ राइट, लेफ्टिनेंट कर्नल एलेक्जेंडर की कब्रें हैं।
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व्हाटसेन की मौत के बाद नैनीताल में बंद हुआ था पोलो का खेल
नैनीताल। प्रो. अजय रावत बताते हैं कि आजादी से पहले नैनीताल में पोलो का खेल अंग्रेजों का सबसे प्रिय खेल था जो मल्लीताल स्थित फ्लैट्स मैदान में खेला जाता था। वर्ष 1935 में एक दिन मैदान में पोलो खेल के दौरान खिलाड़ी कैप्टन व्हाटसेन घोड़े से गिर गए और उनकी मौत हो गई थी। उसके बाद से नैनीताल में पोलो का खेल बंद कर दिया गया।
पाइंस कब्रिस्तान के कायाकल्प की योजना
नैनीताल। नैनीताल के कब्रिस्तानों की महत्ता को देखते हुए जिला प्रशासन पाइंस स्थित कब्रिस्तान को हैरिटेज कब्रिस्तान बनाने के लिए काम कर रहा है। जिलाधिकारी धीराज सिंह गर्ब्याल ने बताया कि पाइंस स्थित कब्रिस्तान में कई अंग्रेज अधिकारियों की कब्रें आज भी मौजूद हैं जो देखरेख के अभाव में टूट चुकी हैं। उन्होंने बताया कि जिला प्रशासन लगभग डेढ़ करोड़ की लागत से इस कब्रिस्तान की मरम्मत करा रहा है ताकि विदेश से अपने पूर्वजों को जानने और उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए लोग यहां पहुंच सकें।
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प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. अजय रावत बताते हैं कि वर्ष 1841 में नैनीताल में बसासत शुरू हो चुकी थी। तब वर्ष 1842 में आयारपाटा क्षेत्र में पहला कब्रिस्तान अस्तित्व में आया। यह वही क्षेत्र है जहां जिम कार्बेट का घर गनी हाउस है। वर्ष 1892 में इस कब्रिस्तान को बंद कर दिया गया। इसके बाद सूखाताल क्षेत्र में वर्ष 1845 में कब्रिस्तान बनाया गया जिसे 1890 के बाद बंद कर दिया गया। हालांकि आजादी के बाद इसे खोल दिया गया और वर्ष 1955 तक यह कब्रिस्तान अस्तित्व में रहा। इसी कब्रिस्तान में जिम कार्बेट के पिता क्रिस्टोफर विलियम कार्बेट और मां मैरी जेन कार्बेट की कब्रें हैं। नैनीताल का नगरीकरण कराने वाले तत्कालीन कमिश्नर जार्ज थामस ल्यूसिंगटन की कब्र भी यहीं है। प्रो. रावत के अनुसार प्रसिद्ध चित्रकार एलिजाबेथ सैस ब्रूनर और उनकी बेटी एलिजाबेथ ब्रूनर भी सूखाताल कब्रिस्तान में ही दफन हैं। एलिजाबेथ ब्रूनर ने महात्मा गांधी की पोट्रेट बनाई थी। ये दोनों मां-बेटी महात्मा गांधी के भक्त थे। उन्हें डिवाइन पेंटर आफ हंगरी के नाम से भी जाना जाता था। वर्ष 1942 में अंग्रेजों ने इन्हें भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लेने के आरोप में नैनीताल में ही नजरबंद कर दिया था।
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सड़ियाताल में वर्ष 1892 में कब्रिस्तान बनाया गया। इसे सिविल पब्लिक के लिए बनाया गया था। प्रो. रावत के अनुसार वर्ष 1895 में पाइंस में स्थापित कब्रिस्तान विशेष रूप से अंग्रेज अफसरों के लिए था। इस कब्रिस्तान में द्वितीय विश्व युद्ध के मेजर आरसी बडन समेत वर्ष 1899 से 1902 तक चले अफ्रीका के बोअर वार के कई ऐसे सैन्य अधिकारियों (बंदियों) की भी कब्रें हैं जिन्हें भीमताल स्थित आड़ू के मैदान में रखा गया था और वहां उनकी मौत हो गई थी। इनमें मेजर जनरल वाइस, कर्नल कमांडेंट न्यूजेंट, मेजर रोजडी, कैप्टन ओ राइट, लेफ्टिनेंट कर्नल एलेक्जेंडर की कब्रें हैं।
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व्हाटसेन की मौत के बाद नैनीताल में बंद हुआ था पोलो का खेल
नैनीताल। प्रो. अजय रावत बताते हैं कि आजादी से पहले नैनीताल में पोलो का खेल अंग्रेजों का सबसे प्रिय खेल था जो मल्लीताल स्थित फ्लैट्स मैदान में खेला जाता था। वर्ष 1935 में एक दिन मैदान में पोलो खेल के दौरान खिलाड़ी कैप्टन व्हाटसेन घोड़े से गिर गए और उनकी मौत हो गई थी। उसके बाद से नैनीताल में पोलो का खेल बंद कर दिया गया।
पाइंस कब्रिस्तान के कायाकल्प की योजना
नैनीताल। नैनीताल के कब्रिस्तानों की महत्ता को देखते हुए जिला प्रशासन पाइंस स्थित कब्रिस्तान को हैरिटेज कब्रिस्तान बनाने के लिए काम कर रहा है। जिलाधिकारी धीराज सिंह गर्ब्याल ने बताया कि पाइंस स्थित कब्रिस्तान में कई अंग्रेज अधिकारियों की कब्रें आज भी मौजूद हैं जो देखरेख के अभाव में टूट चुकी हैं। उन्होंने बताया कि जिला प्रशासन लगभग डेढ़ करोड़ की लागत से इस कब्रिस्तान की मरम्मत करा रहा है ताकि विदेश से अपने पूर्वजों को जानने और उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए लोग यहां पहुंच सकें।