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राष्ट्रीय भावना की जन्मदाता है संस्कृत : मिश्र
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 28 May 2017 02:00 AM IST
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- फोटो : amar ujala
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संस्कृत राष्ट्रीय भावना की जन्मदाता है। ऋग्वेद और यजुर्वेद के मंत्र इस तथ्य के प्रमाण हैं। संस्कृत हमारे पुरखों की भाषा है। यह बात संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी के पूर्व कुलपति और राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित प्रो. अभिराज राजेंद्र मिश्र ने कही।
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मिश्र शनिवार को डीएसबी परिसर के संस्कृत विभाग के द्वारा हरियाणा ग्रंथ अकादमी के सहयोग से हरमिटेज भवन सभागार में आयोजित संस्कृति साहित्य में राष्ट्रीय भावना विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे।
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विशिष्ट अतिथि उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय हरिद्वार के पूर्व कुलपति प्रो. महावीर अग्रवाल ने कहा कि भारत को दुनिया का मार्गदर्शक संस्कृत भाषा की वजह से ही माना जाता है। अध्यक्षीय संबोधन में डीएसबी परिसर के निदेशक प्रो. एसपीएस मेहता ने देववाणी के प्रचार-प्रसार पर जोर दिया।
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यूजीसी एचआरडीसी के निदेशक प्रो. बीएल साह ने भी संगोष्ठी को संबोधित किया। इस दौरान संस्कृत विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. जया तिवारी, कूटा के अध्यक्ष प्रो. ललित तिवारी, संगोष्ठी की सह संयोजक डॉ. लज्जा भट्ट, डॉ. नीता आर्या, डॉ. हेमवती नंदन पनेरू, हरियाणा ग्रंथ अकादमी के डॉ. सुधीर कुमार, डॉ. अयोध्या नाथ वैष्णव, प्रो. जेके गोदियाल, प्रो. किरन टंडन, प्रो. जेएन जोशी, प्रो. जय दत्त उप्रेती आदि थे। संचालन डॉ. विनय विद्या अलंकार और प्रो. कमला पंत ने किया।
गौरवशाली है संस्कृत का इतिहास : प्रो. अभिराज
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी के पूर्व कुलपति प्रो. अभिराज राजेंद्र मिश्र ने कहा कि संस्कृत भाषा ही एक ऐसी भाषा है, जिसका समृद्ध, गौरवशाली इतिहास है। दजला-फरात (इराक), नदी घाटी सभ्यता, मिश्र के पिरामिड, बेबीलोनिया का इतिहास और इंडोनेशिया की भाषा में संस्कृत के शब्दों की मौजूदगी इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
उन्होंने कहा कि 1950 में ही यदि संस्कृत को देश की राजभाषा का दर्जा मिल गया होता तो पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण की भाषाओं का झगड़ा नहीं होता। ब्यूरो
संस्कृत भाषा की ही देन है श्रद्धा भाव : प्रो. महावीर
उत्तराखंड संस्कृत विवि हरिद्वार के पूर्व कुलपति प्रो. महावीर अग्रवाल ने कहा कि देश और ग्रंथों के प्रति अटूट श्रद्धा की वजह से ही हम देश को भारत माता और ग्रंथों को वेद माता कहते हैं। ऐसा उच्चारण विश्व के किसी अन्य देश में नहीं होता।
देखा जाए तो भारत में अपने देश के प्रति यह श्रद्धा का भाव संस्कृत भाषा की ही देन है। उन्होंने कहा कि हमारे वेद, पुराण, उपनिषद अपार ज्ञान का भंडार हैं, जिनका चिंतन, मनन और अनुसरण कर हम विश्व के मार्गदर्शक बनने के साथ ही देववाणी संस्कृत के उन्नयन में भागीदार बन सकते हैं।