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रावत नाम की पहेली का तोड़ नहीं मिला अभी तक भाजपा को
सुधाकर भट्ट
Updated Sun, 04 Dec 2016 01:40 AM IST
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सदन में जाते मुख्यमंत्री हरीश रावत।
- फोटो : AmarUjala
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विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी भाजपा को प्रदेश में हरीश रावत नाम की पहेली का तोड़ नहीं मिल पा रहा है। मुख्यमंत्री हरीश रावत की थाह लेने में जुटी भाजपा रावत का नाम जपने के लिए मजबूर है।
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अब रावत नाम की पहेली को सुलझाने को सात दिसंबर को हल्द्वानी में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के पिटारे से नया फार्मूला निकलने की उम्मीद भाजपा कर रही है।
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2014 में राज्य की बागडोर हरीश रावत के हाथ में क्या आई कि भाजपा भी कई तरह के प्रयोग करने को मजबूर हो गई। भाजपा ने 2014 में ही हरीश रावत पर केदारनाथ में आपदा प्रबंधन के बहाने सीधा हमला बोला था।
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इसके बाद भी आपदा के बहाने रावत को घेरने की भाजपा की कोशिश कभी सान पर नहीं चढ़ पाई। यहां तक 18 मार्च, 2016 को सदन में कुछ कांग्रेसी विधायकों और इसके बाद का राष्ट्रपति शासन का दांव भी भाजपा के लिए भोथरा ही साबित हुआ।
अब विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही भाजपा फिर हरीश रावत का नाम जपने को मजबूर है। हाल ही में अल्मोड़ा में हुई सभा में भी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को भी लोगों को हरीश रावत के स्टिंग ऑपरेशन, शराब मामले में फंसे एक अधिकारी लेकर जमीन के कारोबार तक के मामलों की याद दिलानी पड़ी थी।
इससे पहले हल्द्वानी में ही हुई भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में भी हरीश रावत का ही नाम गूंजा था। इस बैठक में भाजपा ने अपने नेताओं को हरीश रावत की स्टिंग ऑपरेशन की सीडी दिखाई थी।
मुसीबत यह है कि हरीश रावत भी कुछ खास मामलों में पत्ते नहीं खोल रहे हैं। उनके चुनाव लड़ने से लेकर, संगठन के साथ खाई पाटने, मंत्रियों को रूठने देने और मनाने सहित कई अन्य मामलों में कोहरे की चादर लिपटी पड़ी है।
भाजपा का अनुमान है कि रावत केदारनाथ से चुनाव लड़ सकते हैं। भाजपा के ही अजेंद्र अजय के मुताबिक मुख्यमंत्री हरीश रावत अब तक केदारनाथ में 106 से अधिक घोषणाएं कर चुके हैं और 36 से ज्यादा चक्कर केदारनाथ के लगा चुके हैं।
इस अति सक्रियता के बाद भी भाजपा यह तय नहीं कर पाई है कि रावत को केदारनाथ में घेरा जाए या नहीं। इसी तरह अपने वर्तमान निर्वाचन क्षेत्र धारचूला से पूर्व विधायक हरीश धामी को आगे कर रावत इस विधानसभा में भी अपने खिलाफ खुल रहे मोर्चे की धार कुं द कर चुके हैं।
रावत के आभा मंडल में गिरफ्तार भाजपा को प्रदेश सरकार के अन्य मंत्री तक दिखाई नहीं पड़ रहे हैं। पिछले लंबे समय में शायद ही कोई एक मामला हो जो भाजपा ने मंत्रियों के खिलाफ उठाया हो। सदन में कई मंत्रियों को घेरने में सफल रहने वाली भाजपा का उत्साह सड़क तक पहुंचते ही ठंडा हो जा रहा है।
भाजपा ने निशाना साधा भी तो विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल पर। मुसीबत यह है कि कुंजवाल पर किया गया कोई भी वार न सीधे कांग्रेस पर चोट करता है और न सीधे सरकार पर।
प्रदेश की कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार को लेकर हमला बोलने, केंद्र की योजनाओं का प्रचार करने और मुख्यमंत्री का मुकाबला करने को अपने केंद्रीय मंत्रियों को प्रदेश में नई घोषणाओं के लिए उतारने के बाद भी भाजपा रावत को लेकर पसोपेश में है।
पार्टी नेताओं की मानें तो हल्द्वानी में सात दिसंबर को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की जनसभा में कोई नया फार्मूला निकला तो ठीक, वरना भाजपा नोटबंदी के अस्त्र के सटीक निशाने पर बैठने की दुआ पर ही भरोसा किए हुए है।
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