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कवियों में कम हो रहा फक्कड़पन
अमर उजाला ब्यूरो हल्द्वानी
Updated Sun, 26 Feb 2017 01:05 AM IST
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कवियों में कम हो रहा फक्कड़पन
- फोटो : अमर उजाला
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भारत विकास परिषद हल्द्वानी शाखा की ओर से शनिवार को सुबह साढे़ नौ बजे से अतिथि रेस्टोरेंट परिसर, रामपुर रोड देवलचौड़ में कुमाऊंनी साहित्यकार कौतिक का आयोजन किया गया। इस दौरान पूरे कुमाऊं से आए तीस से अधिक साहित्यकारों ने मौजूदा राजनीति और सामाजिक कुरीतियों पर जमकर प्रहार किया।
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वक्ताओं ने कहा कि जहां पहले के कवि जगह-जगह घूमकर सामाजिक बुराइयों का विश्लेषण कर उन पर तंज कसते थे। वहीं वर्तमान चकाचौंध के जमाने में कवियों में फक्कड़पन कम हो रहा है।
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इस कारण दिल को छू लेने वाली रचनाएं कम आ रही हैं, शेरदा अनपढ़ और गिरीश तिवारी गिर्दा की कविताओं की तरह पैनापन नहीं रहा। आजकल के युवा कवि जल्द से जल्द कविताएं लिखकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देना चाहते हैं। इससे रचनाओं का संपादन नहीं होता।
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कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मेयर डा. जोगेंद्र रौतेला ने कहा कि साहित्य को बढ़ावा देने से संस्कृति सुदृढ़ होती है। कुमाऊंनी में साहित्य को अभी और मजबूत करने की जरूरत है। भारत विकास परिषद के रीजनल सचिव भगवान सहाय ने कहा कि समाज को अच्छे साहित्य की हमेशा जरूरत रहती है।
साहित्यकार अगर गहन मंथन के बाद उपन्यास, कविताएं, कहानियां लिखें तो इससे आने वाली पीढ़ी को लाभ होता है। विशिष्ट अतिथि बीएस बिष्ट ने कहा कि अच्छी कविताएं नहीं होने के कारण कवि सम्मेलनों से श्रोताओं की दूरी बढ़ रही है।
मंच संचालन दीपक अग्रवाल ने किया। इस दौरान भुवनेश विराट, राजेंद्र ढैला, शेखर पाखी, कस्तूरी लाल तागरा रुद्रपुर, जगदीश कुमुद खटीमा, सुनील पाठक रुद्रपुर, मोहन जोशी गरुड़ बागेश्वर, तारा पाठक हल्द्वानी, नारायण सिंह बिष्ट हल्द्वानी, दामोदर जोशी देवांशु गौलापार, विवेक वशिष्ठ हल्द्वानी, कन्हैय्या लाल स्नेही हल्द्वानी, सबाहत खान रुद्रपुर, पुष्पलता जोशी हल्द्वानी, भुवनेश गुप्ता हल्द्वानी, राज सक्सेना खटीमा, विवेक प्रजापति काशीपुर, आकाश चौहान रुद्रपुर, दिनेश ढाली दिनेशपुर, सोनू उप्रेती सांची अल्मोड़ा, संजय पाठक हल्द्वानी, भास्कर कुकरेती दिनेशपुर, पवनेश ठकुराठी पिथौरागढ़, भुवन बिष्ट रानीखेत, विमला जोशी हल्द्वानी, अभिजात कांडपाल निडर हल्द्वानी ने अपनी रचनाएं सुनाईं।
कौतिक में खूब बिकीं पुस्तकें
भारत विकास परिषद की ओर से आयोजित कुमाऊंनी साहित्यकार कौतिक में पुस्तकों की भी खूब बिक्री हुई। इस दौरान उपन्यास, कविता संग्रह अधिक पसंद किए गए। कपूत, दोराहे पर जिंदगी, पैकेज का पपलू और पवनेश ठकुराठी का कविता संग्रह आदि पुस्तकों की डिमांड रही।