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रोजगार की शर्त पर सेहत से खिलवाड़

Wed, 04 Jan 2017 01:21 AM IST
निशांत खनी
निशांत खनी Updated Wed, 04 Jan 2017 01:21 AM IST
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Playing on the health condition of employment
रोजगार की शर्त पर सेहत से खिलवाड़ - फोटो : अमर उजाला
बरेली रोड में आबादी एरिया में खुले स्टोन क्रशर ग्रामीणों की जिंदगी से खेल रहे हैं। क्रशर हवा ही नहीं पानी में भी जहर घोल रहे हैं। क्रशरों से उड़ने वाली धूल-मिट्टी से गांवों की खुशहाल जिंदगी बदतर हो गई है।
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धूल से बचने के लिए घरों की खिड़कियां नहीं खुलती हैं। क्रशरों के 24 घंटे साल भर होने वाले शोरगुल और धूल-मिट्टी से ग्रामीण परेशान हैं। क्रशर संचालकों ने पत्थर और रोड़ी खदान और डंपिंग के लिए गहरे और चौड़े गड्ढे खोदे हैं।
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बरेली रोड नेशनल हाइवे में लालकुआं से लेकर तीनपानी बाईपास तक कई स्टोन क्रशर हैं। अधिकांश क्रशर आबादी एरिया में हैं। गोरापड़ाव, हाथीखाल गांव का क्रशर भी आबादी क्षेत्र में है। हाथीखाल ग्रामपंचायत की करीब दो हजार आबादी है।
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क्रशर की धूल मिट्टी और शोरगुल से आसपास के ग्रामीण प्रभावित हैं। क्रशर के पास ही ट्यूबवेल, मंदिर, प्राथमिक स्कूल और आंगनबाड़ी सेंटर भी है। ग्रामीणों के मुताबिक आबादी वाले जिन इलाकों में क्रशर लगे हैं छतों पर धूल मिट्टी के चलते कपड़े नहीं सूखा पाते हैं।

खिड़कियां बंद होने से उनकी झिरियां धूल से भर गई हैं। सुबह से शाम तक महिलाएं घरों में झाडू़ पोछा ही करती हैं। हर बार झाडू़ मारने पर घर से धूल का ढेर निकलता है। क्रशर परिसर में गहरी खाई खोदी गई हैं।

ग्रामीणों का आरोप है खाई में गंदा पानी छोड़ा जाता है। बारिश में खाई दलदल हो जाती है। खेतीबाड़ी पर भी इसका असर पड़ा है। क्रशर वाले इलाकों में औसत बारिश कम हो गई है। खेतों में धूल मिट्टी की परत जमने से बीज अंकुरित होने में सामान्य से अधिक समय लगने लगा है।

सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी ने क्रशरों के संचालन के लिए कड़े मानक बनाए हैं। क्रशर अधिकांश मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं। प्रदेश सरकार ने आबादी एरिया में चल रहे क्रशरों को बाहर करने के लिए दो साल की मोहलत और बढ़ा दी है। क्रशरों का मामला एनजीटी में भी विचाराधीन है। क्रशर स्वामी गड्ढों को भरने के लिए सेंचुरी की राख इस्तेमाल करते हैं, जो भूमिगत जलस्तर को दूषित कर रहा है।
- ललित मिश्रा, क्षेत्र पंचायत सदस्य

क्रशरों से ग्रामीणों को रोजगार मिला है। रोजगार की शर्त में ग्रामीण अपनी और आने वाली पीढ़ी की सेहत के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। गोरापड़ाव गेट में चलने वाले अधिकांश डंपर क्रशर में रेता और पत्थर डालते हैं। अधिकांश वाहन स्थानीय ग्रामीणों के हैं। क्रशरों से रोजगार मिला होने से चुप्पी लेकर तमाम बीमारियाें का शिकार हो रहे हैं।
- सुरेश जोशी, ग्राम प्रधान

 क्रशर लॉबी के आगे शासन और प्रशासन झुका है। जनता के दबाव में कार्रवाई होती है, लेकिन फिर अनुमति मिल जाती है। यह सिलसिला सालों से चलता आ रहा है। इसलिए भी ग्रामीणों ने खामोशी ले ली है। गांव की सड़क पर सुबह छह बजे से नौ बजे पैदल चलना मुश्किल होता है। सड़क पर गौला में जाने के लिए वाहनों की कतार लग जाती है। स्कूली बच्चों को आने एवं जाने में परेशानी होती है।
- कांता प्रसाद, ग्रामीण

क्रशर की धूल मिट्टी से सबसे अधिक परेशानी महिलाओं को झेलनी पड़ती है। कपड़े धोने के बाद सुखाने की परेशानी है। गांव में छतों पर कपड़े सुखाने पर मिट्टी से सन जाते हैं। झाड़ू लगाने में धूल का ढेर आता है। महिलाएं सुबह से शाम तक झाड़ू और पोछा लगाने में रह जाती हैं।
- नीमा कांडपाल, ग्रामीण

क्रशर रातभर शोरगुल करते हैं। इनके शोरगुल और धूल मिट्टी से बुजुर्गों और बच्चों को सबसे अधिक परेशानी हो रही है। पिता नारायण दत्त दमे के शिकार हैं। गांव में कई और बुजुर्ग भी बीमारियों से पीड़ित हैं। समस्या कोई सुनने वाला नहीं है। ग्रामीण सिर्फ रोजगार छिनने की डर से खामोश है।

- नंद किशोर, ग्रामीण


मानकों के अनुरूप क्रशर चल रहा है। रात को क्रशर चलाने अनुमति ली गई है। 20 मीटर गहरे गड्ढे खोदने की अनुमति है और उसमें आरबीएम स्टाक किया जाता है। गड्ढों में स्टाक करने से बाउंड्री का खर्च बच जाता है और धूल मिट्टी भी कम उड़ती है।
- अभिषेक अग्रवाल, क्रशर संचालक

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