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अब बस्तड़ी से उम्मीद
सुधाकर भट्ट, हल्द्वानी।
Updated Sat, 30 Jul 2016 11:13 PM IST
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आपदा के बाद फिर उठ खड़े होने की ताकत को भूल रहे पहाड़ के लिए बस्तड़ी एक उम्मीद बनकर सामने आया है। मजबूत नाते-रिश्तेदारी, गांव के साथ ही छानियों का भी साम्राज्य, नदी-नालों से दूर गांव और एक -दूसरे की नुकसान से उबरने में मदद। ये सब आपदा से लड़ने के तरीके थे और इनके भरोसे ही गांव हर आपदा के बाद फिर उठ खड़ा होता था। एक जून की आपदा के बाद ध्वस्त होने के बाद बस्तड़ी फि र बसने की चाहत में है।
आपदाओं का सामना पहाड़ सदियों से करता आया है। ऐसे में इन आपदाओं से जूझने की परंपराएं भी पहाड़ में विकसित हुई। विशेषज्ञों के मुताबिक पहाड़ के गांवों में पहले गोठार हुआ करते थे। गांव के बीच के इस स्थान में अनाज का भंडारण करके रखा जाता था। आपदा से लड़ने की समझ ने इतना तो बता ही दिया था कि एक ही जगह पर सब कुछ नहीं रखना चाहिए। आपदा के समय में कहीं नुकसान होगा तो कहीं कुछ बचा भी रहेगा।
राज्य आपदा प्रबंधन केंद्र के अधिशासी निदेशक पीयूष रौतेला के मुताबिक आपदा से जूझने के लिए कई परंपराएं लोगों ने विकसित की थी। पीने के पानी के लिए पेयजल स्रोत तक गांव से दूर होते थे। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बांज के जंगलों को संवार कर रखा जाता था। आपदा से लड़ने की एक और परंपरा थी, मजबूत नाते रिश्तेदारी और देवी-देवताओं पर खास विश्वास। जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी डा. आरएस राणा के मुताबिक आज भी आपदा से प्रभावित लोगों को दिलासा देने के लिए पूजा-प्रार्थना एक बेहतर सामाजिक तरीका है।
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आपदाओं का सामना होने पर ऐसा नहीं होेता था कि लोग गांव ही छोड़ने को तैयार हो जाएं। पिथौरागढ़ के डीएस मर्तोलिया के मुताबिक मुन्स्यारी में उनकेपैतृक गांव बाला में 1980 में बादल फटने से खासा नुकसान हुआ था। उस समय गांव के लोगों को शिफ्ट करने के लिए भी प्रस्ताव तैयार किया गया था। गांव के लोगों ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। कारण, पूरा गांव एक डोर से बंधा था। अब स्थिति बदल गई है। आपदा प्रबंधन उप सचिव संतोष बडोनी के मुताबिक प्रदेश में आपदा से प्रभावित अधिकतर गांवों केलोग मैदानी इलाकों में बसने की ही मांग कर रहे हैं। इसके विपरीत बस्तड़ी का संघर्ष साबित कर रहा है कि उम्मीद की एक किरण बाकी है। यह किरण है बस्तड़ी के लोगों की खेत खलिहान से दूर न होने की चाहत।
क्या थी परंपराएं
खेत एक जगह पर न होकर फैले हुए होते थे। इससे एक जगह नुकसान होने पर दूसरी जगह से मदद मिल जाती थी।
सुरक्षा के लिहाज से गांव नदी नालों से दूर हुआ करते थे। पीने केपानी के स्रोत घरों से दूर होते थे। खाल (छोटे तालाब) बनाए जाते थे और इनका रखरखाव किया जाता था। यह गांवों के जल प्रबंधन का तरीका था।
सामुदायिक भावना गांवों की सबसे बड़ी ताकत थी। खेती से लेकर अन्य सभी सामाजिक काम मिल बांटकर किए जाते थे। आपदा पीड़ित की सब मिलकर मदद करते थे।
गांव के बुजुर्ग आज भी कहते हैं कि जमीन को कमजोर मत होने दो। मकान मिट्टी और पत्थर के हों।
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आपदाओं का सामना पहाड़ सदियों से करता आया है। ऐसे में इन आपदाओं से जूझने की परंपराएं भी पहाड़ में विकसित हुई। विशेषज्ञों के मुताबिक पहाड़ के गांवों में पहले गोठार हुआ करते थे। गांव के बीच के इस स्थान में अनाज का भंडारण करके रखा जाता था। आपदा से लड़ने की समझ ने इतना तो बता ही दिया था कि एक ही जगह पर सब कुछ नहीं रखना चाहिए। आपदा के समय में कहीं नुकसान होगा तो कहीं कुछ बचा भी रहेगा।
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राज्य आपदा प्रबंधन केंद्र के अधिशासी निदेशक पीयूष रौतेला के मुताबिक आपदा से जूझने के लिए कई परंपराएं लोगों ने विकसित की थी। पीने के पानी के लिए पेयजल स्रोत तक गांव से दूर होते थे। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बांज के जंगलों को संवार कर रखा जाता था। आपदा से लड़ने की एक और परंपरा थी, मजबूत नाते रिश्तेदारी और देवी-देवताओं पर खास विश्वास। जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी डा. आरएस राणा के मुताबिक आज भी आपदा से प्रभावित लोगों को दिलासा देने के लिए पूजा-प्रार्थना एक बेहतर सामाजिक तरीका है।
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आपदाओं का सामना होने पर ऐसा नहीं होेता था कि लोग गांव ही छोड़ने को तैयार हो जाएं। पिथौरागढ़ के डीएस मर्तोलिया के मुताबिक मुन्स्यारी में उनकेपैतृक गांव बाला में 1980 में बादल फटने से खासा नुकसान हुआ था। उस समय गांव के लोगों को शिफ्ट करने के लिए भी प्रस्ताव तैयार किया गया था। गांव के लोगों ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। कारण, पूरा गांव एक डोर से बंधा था। अब स्थिति बदल गई है। आपदा प्रबंधन उप सचिव संतोष बडोनी के मुताबिक प्रदेश में आपदा से प्रभावित अधिकतर गांवों केलोग मैदानी इलाकों में बसने की ही मांग कर रहे हैं। इसके विपरीत बस्तड़ी का संघर्ष साबित कर रहा है कि उम्मीद की एक किरण बाकी है। यह किरण है बस्तड़ी के लोगों की खेत खलिहान से दूर न होने की चाहत।
क्या थी परंपराएं
खेत एक जगह पर न होकर फैले हुए होते थे। इससे एक जगह नुकसान होने पर दूसरी जगह से मदद मिल जाती थी।
सुरक्षा के लिहाज से गांव नदी नालों से दूर हुआ करते थे। पीने केपानी के स्रोत घरों से दूर होते थे। खाल (छोटे तालाब) बनाए जाते थे और इनका रखरखाव किया जाता था। यह गांवों के जल प्रबंधन का तरीका था।
सामुदायिक भावना गांवों की सबसे बड़ी ताकत थी। खेती से लेकर अन्य सभी सामाजिक काम मिल बांटकर किए जाते थे। आपदा पीड़ित की सब मिलकर मदद करते थे।
गांव के बुजुर्ग आज भी कहते हैं कि जमीन को कमजोर मत होने दो। मकान मिट्टी और पत्थर के हों।