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शहादत दिवस पर याद किये गए चंद्रशेखर आजाद
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रामनगर क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद के चित्र बच्चों द्वारा बनाए गए।
- फोटो : RAMNAGAR
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रामनगर/लालकुआं। क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद के शहादत दिवस पर याद किया गया। सावित्रीबाई फुले स्कूल में बच्चों ने देशभक्ति गीत प्रस्तुत किए।
विद्यालय की शिक्षिका अंजलि रावत और शिक्षिक सुमित कुमार ने उनके जीवन के बारे में जानकारी दी। रचनात्मक शिक्षक मंडल के राज्य संयोजक नवेंदु मठपाल ने कहा कि चंद्रशेखर आजाद भारत के क्रांतिकारी आंदोलन की दो पीढ़ियों के साथ काम करने वाले नेता थे। वे 1922 में क्रांतिकारी आंदोलन में शरीक हुए थे, तब आंदोलन के नेता रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक़उल्ला खान आदि थे। 1925 में काकोरी कांड के बाद हुई धरपकड़ और गिरफ्तारियों में जो लोग पुलिस के हत्थे नहीं चढ़े आजाद उनके अगुवा थे। पुलिस को छकाने का यह सिलसिला आजाद के जीवन पर्यंत चला। आजाद वेश बदलने में माहिर थे। विश्वनाथ वैशम्पायन द्वारा लिखित पुस्तक अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद में आजाद के जीवन के विविध पहलुओं पर जानकारी दी गई है। 27 फरवरी 1931 को अल्फ्रेड पार्क में जिस पेड़ के पीछे से आजाद अंग्रेजों का मुकाबला करते हुए शहीद हो गए, उस पेड़ पर लोगों ने आजाद लिख दिया। पार्क को विश्वविद्यालय के छात्रों ने आजाद पार्क कहना शुरू कर दिया। लोग उस पेड़ के नीचे फूलमाला चढ़ाने लगे तो अंग्रेजों ने वह पेड़ ही कटवा डाला, बाद में वहां पर पुन: जामुन का पेड़ लगाया गया। बच्चों ने चंद्रशेखर आजाद का चित्र भी बनाया। इस दौरान ग्राम प्रधान मो ताहिर, आरजू सैफी, अरसी, प्रभात कुमार आदि थे।
बिंदुखत्ता के शास्त्री नगर कन्या जूनियर स्कूल में प्रगतिशील महिला एकता केंद्र, परिवर्तनकामी छात्र संगठन और प्रगतिशील भोजन माता संगठन ने चंद्रशेखर आजाद को श्रद्धांजलि दी। सभा में बिंदु गुप्ता ने कहा कि शहीदों का सपना था कि देश में हर कोई बराबर होगा, किसी युवा को बेरोजगारी के चलते, किसी महिला को यौन हिंसा के चलते, किसी को जातीय उत्पीड़न के चलते आत्महत्या करने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा।
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विद्यालय की शिक्षिका अंजलि रावत और शिक्षिक सुमित कुमार ने उनके जीवन के बारे में जानकारी दी। रचनात्मक शिक्षक मंडल के राज्य संयोजक नवेंदु मठपाल ने कहा कि चंद्रशेखर आजाद भारत के क्रांतिकारी आंदोलन की दो पीढ़ियों के साथ काम करने वाले नेता थे। वे 1922 में क्रांतिकारी आंदोलन में शरीक हुए थे, तब आंदोलन के नेता रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक़उल्ला खान आदि थे। 1925 में काकोरी कांड के बाद हुई धरपकड़ और गिरफ्तारियों में जो लोग पुलिस के हत्थे नहीं चढ़े आजाद उनके अगुवा थे। पुलिस को छकाने का यह सिलसिला आजाद के जीवन पर्यंत चला। आजाद वेश बदलने में माहिर थे। विश्वनाथ वैशम्पायन द्वारा लिखित पुस्तक अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद में आजाद के जीवन के विविध पहलुओं पर जानकारी दी गई है। 27 फरवरी 1931 को अल्फ्रेड पार्क में जिस पेड़ के पीछे से आजाद अंग्रेजों का मुकाबला करते हुए शहीद हो गए, उस पेड़ पर लोगों ने आजाद लिख दिया। पार्क को विश्वविद्यालय के छात्रों ने आजाद पार्क कहना शुरू कर दिया। लोग उस पेड़ के नीचे फूलमाला चढ़ाने लगे तो अंग्रेजों ने वह पेड़ ही कटवा डाला, बाद में वहां पर पुन: जामुन का पेड़ लगाया गया। बच्चों ने चंद्रशेखर आजाद का चित्र भी बनाया। इस दौरान ग्राम प्रधान मो ताहिर, आरजू सैफी, अरसी, प्रभात कुमार आदि थे।
बिंदुखत्ता के शास्त्री नगर कन्या जूनियर स्कूल में प्रगतिशील महिला एकता केंद्र, परिवर्तनकामी छात्र संगठन और प्रगतिशील भोजन माता संगठन ने चंद्रशेखर आजाद को श्रद्धांजलि दी। सभा में बिंदु गुप्ता ने कहा कि शहीदों का सपना था कि देश में हर कोई बराबर होगा, किसी युवा को बेरोजगारी के चलते, किसी महिला को यौन हिंसा के चलते, किसी को जातीय उत्पीड़न के चलते आत्महत्या करने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा।
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