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पति पर गोली बरसाने वालों को मरवा दो
अरविंद उपाध्याय हल्द्वानी।
Updated Sun, 06 Aug 2017 02:51 AM IST
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शहीद मेजर कमलेश पांडे की पत्नी रचना और नन्ही बिटिया भूमिका।
- फोटो : amar ujala
शहीद मेजर कमलेश पांडे की पत्नी रचना के मन में पति को खोने दर्द तो है मगर वह उन आतंकवादियों को सबक सिखाने की मांग कर रहीं हैं जिनकी गोली से उनके पति देश के लिए शहीद हो गए।
उनका कहना है कि उन्हें धन दौलत कुछ नहीं चाहिए बस आतंकियों की हर हाल में मौत ही उनकी चाहत है। जीवनसाथी को खोने के बाद रचना बुरी तरह टूट चुकी हैं। दो साल की बेटी भूमि को गोद में बैठाकर गम हल्का करने की कोशिश करती हैं लेकिन आंसू थमने का नाम नहीं लेते।
रचना ने बताया कि तीन साल पहले कमलेश से शादी हुई थी। दोनों ने अपने परिवार को लेकर काफी सपने देखे थे। कमलेश बेटी भूमि कोअभी से अच्छे प्ले स्कूल में दाखिला करवाना चाहते थे। हम सबने सोचा था कि 26 अगस्त को बेटी का जन्म दिन धूमधाम से मनाएंगे मगर सब अरमान धरे रह गए।
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दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट रचना घर के कोने में बैठकर फूट फूटकर रो रही हैं। परिजन ढाढ़स बंधा रहे हैं। कह रहे हैं कि अब भूमि के लिए जीना होगा। रचना कभी आसमान को देखकर तो कभी रास्तों को निहारकर अपने गमों को भुलाने की कोशिश कर रही हैं।
शनिवार को वह घर में अपनी बिटिया के साथ खेल रही थी लेकिन चेहरे पर आंखों से गिरते आंसू गवाही दे रहे थे कि अभी गमों का पहाड़ हल्का नहीं हुआ है।
बेटी के सवाल का किसी के पास नहीं जवाब
मासूम भूमि ही परिवार वालों के गम को हल्का करने का साधन बनी हुई है। कभी वह मां की गोद में बैठ जाती है तो कभी अपने चाचा धीरेज की गोद में बैठकर सवाल करती रहती है। भूमि दिन में कई बार एक ऐसा सवाल पूछती कि पापा कहां हैं..लेकिन इसका जवाब किसी के पास नहीं होता। मासूम का यह सवाल मां और दादा के दिलों को झकझोर कर रख देता।
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उनका कहना है कि उन्हें धन दौलत कुछ नहीं चाहिए बस आतंकियों की हर हाल में मौत ही उनकी चाहत है। जीवनसाथी को खोने के बाद रचना बुरी तरह टूट चुकी हैं। दो साल की बेटी भूमि को गोद में बैठाकर गम हल्का करने की कोशिश करती हैं लेकिन आंसू थमने का नाम नहीं लेते।
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रचना ने बताया कि तीन साल पहले कमलेश से शादी हुई थी। दोनों ने अपने परिवार को लेकर काफी सपने देखे थे। कमलेश बेटी भूमि कोअभी से अच्छे प्ले स्कूल में दाखिला करवाना चाहते थे। हम सबने सोचा था कि 26 अगस्त को बेटी का जन्म दिन धूमधाम से मनाएंगे मगर सब अरमान धरे रह गए।
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दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट रचना घर के कोने में बैठकर फूट फूटकर रो रही हैं। परिजन ढाढ़स बंधा रहे हैं। कह रहे हैं कि अब भूमि के लिए जीना होगा। रचना कभी आसमान को देखकर तो कभी रास्तों को निहारकर अपने गमों को भुलाने की कोशिश कर रही हैं।
शनिवार को वह घर में अपनी बिटिया के साथ खेल रही थी लेकिन चेहरे पर आंखों से गिरते आंसू गवाही दे रहे थे कि अभी गमों का पहाड़ हल्का नहीं हुआ है।
बेटी के सवाल का किसी के पास नहीं जवाब
मासूम भूमि ही परिवार वालों के गम को हल्का करने का साधन बनी हुई है। कभी वह मां की गोद में बैठ जाती है तो कभी अपने चाचा धीरेज की गोद में बैठकर सवाल करती रहती है। भूमि दिन में कई बार एक ऐसा सवाल पूछती कि पापा कहां हैं..लेकिन इसका जवाब किसी के पास नहीं होता। मासूम का यह सवाल मां और दादा के दिलों को झकझोर कर रख देता।