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एक तीर से साधे कई निशाने

Tue, 05 Jul 2016 12:05 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, हल्द्वानी।
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, हल्द्वानी। Updated Tue, 05 Jul 2016 12:05 AM IST
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 विवाद थामने, संतुलन साधने और युवा चेहरे को तरजीह देने की कोशिश में अल्मोड़ा की सुरक्षित सीट के सांसद अजय टम्टा दिग्गजों से बाजी मार ले गये। पार्टी सूत्रों की माने तो संघ के साथ बेहतर तालमेल भी अजय टम्टा के काम आया है। अभी तक भगत सिंह कोश्यारी के समर्थक ही भगत दा के केंद्र में मंत्री बनाये जाने की उम्मीद लगाये बैठे थे।
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भाजपा के साथ सबसे बड़ी मुसीबत यह भी है कि उत्तराखंड उसके लिए खासी बड़ी पहेली साबित हो रही है। हाल ही में प्रांतीय परिषद की बैठक में हल्द्वानी पहुंचे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह तो यहां तक कह गये कि  उत्तराखंड में नहीं जीते तो क्या जीते। राष्ट्रपति शासन लगाने में नुकसान उठाने के बाद से ही भाजपा प्रदेश में बंधे-बंधाये फार्मूले से अलग हटने के लिए मजबूर भी हो गई थी। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट भी इस समय कुमाऊं से हैं। ऐसे में नैनीताल सांसद भगत सिंह कोश्यारी को केंद्र में तरजीह देने पर गढ़वाल की उपेक्षा की तोहमत का खतरा भी था। दूसरी और पूर्व मुख्यमंत्री और हरिद्वार सांसद रमेश पोखरियाल निशंक के समर्थक भी संतुलन के लिहाज से उम्मीद लगाये बैठे थे। निशंक को ठीक चुनाव से पहले जगह देने पर कांग्रेस को बैठे-बिठाये एक मुद्दा देने का खतरा भी था।
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ऐसे में इस आपसी विवाद को थामने के लिए अजय टम्टा के हाथ बाजी जाने दी गई। दूसरी ओर, इस बहाने गढ़वाल और कुमाऊं के संतुलन को साधने की कोशिश भी की गई है। अब भाजपा के लिए गढ़वाल से चुनाव में चेहरा तलाश करना ज्यादा आसान भी हो सकता है। हालांकि , भाजपा का एक खेमा यह भी कह रहा है कि  मुख्यमंत्री हरीश रवत के सामने किसी चेहरे को प्रोजेक्ट करने से भाजपा शायद बचेगी। वहीं, यह भी कहा जा रहा है कि अजय टम्टा को उनके युवा होने का भी फायदा मिला। पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी और पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी 70 की उम्र पार कर चुके हैं। युवा निशंक भी हैं पर निशंक कांग्रेस के सीधे निशाने पर रहे हैं। दूसरी ओर, अजय टम्टा को संघ की नजदीकी का फायदा भी मिला है। 2014 के लोक सभा चुनाव में अजय टम्टा को संघ के दबाव में टिकट मिलने का दावा किया जाता रहा है। यह कनेक्शन एक बार फिर से काम आया है।
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वहीं, अजय टम्टा को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया जाना दलित विरोधी छवि से बाहर निकलने की छटपटाहट को भी माना जा रहा है। हालांकि , यह अभी साफ नहीं है कि भाजपा को इसका फायदा विधानसभा चुनाव में कितना मिलेगा।
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