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अवैध हिरासत मामले में हाईकोर्ट ने दिए सीबीआई जांच के आदेश
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नैनीताल। हाईकोर्ट ने जिला हरिद्वार की गंगनहर पुलिस के दहेज उत्पीड़न के आरोपी को अवैध तरीके से 48 घंटे तक हिरासत में रखने के मामले में सीबीआई से जांच कराने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने गंगनहर पुलिस से इस मामले में उपलब्ध दस्तावेज 15 दिन के भीतर सीबीआई को उपलब्ध कराने को कहा है।
न्यायमूर्ति आलोक सिंह एवं न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार गंगनहर रुड़की क्षेत्र के निवासी धीर सिंह चौहान ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि 2011 में उनके खिलाफ दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज हुआ था। गंगनहर पुलिस ने उन्हें बगैर किसी कानूनी प्रक्रिया के 48 घंटे से अधिक समय तक अपनी कस्टडी में रखा। याचिका में कहा कि पुलिस अधिकारियों से की गई शिकायत पर कोई सुनवाई नहीं हुई। इस पर उन्होंने प्रदेश के लोकायुक्त को दी गई शिकायत में कोतवाली गंगनहर के निरीक्षक, उपनिरीक्षक और दो कांस्टेबलों को इसके लिए दोषी बताया था। लोकायुक्त ने इसकी जांच के आदेश दिए।
याचिका में कहा कि मामले में पुलिस की मंशा पर संदेह व्यक्त करते हुए जिला स्तर के न्यायिक अधिकारियों की शरण ली गई। कहा कि लोकायुक्त के जांच के आदेश को लंबे समय तक लटकाए रखा गया और बाद में पुलिस कर्मियों के खिलाफ दर्ज मुकदमे में क्लोजर रिपोर्ट लगा दी गई। याचिका में मामले की सीबीआई जांच मांग की गई थी। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि पुलिस के स्तर से इस मामले में जांच में गंभीरता नहीं बरती गई है। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस मामले की जांच सीबीआई से कराने के निर्देश दिए हैं।
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न्यायमूर्ति आलोक सिंह एवं न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार गंगनहर रुड़की क्षेत्र के निवासी धीर सिंह चौहान ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि 2011 में उनके खिलाफ दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज हुआ था। गंगनहर पुलिस ने उन्हें बगैर किसी कानूनी प्रक्रिया के 48 घंटे से अधिक समय तक अपनी कस्टडी में रखा। याचिका में कहा कि पुलिस अधिकारियों से की गई शिकायत पर कोई सुनवाई नहीं हुई। इस पर उन्होंने प्रदेश के लोकायुक्त को दी गई शिकायत में कोतवाली गंगनहर के निरीक्षक, उपनिरीक्षक और दो कांस्टेबलों को इसके लिए दोषी बताया था। लोकायुक्त ने इसकी जांच के आदेश दिए।
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याचिका में कहा कि मामले में पुलिस की मंशा पर संदेह व्यक्त करते हुए जिला स्तर के न्यायिक अधिकारियों की शरण ली गई। कहा कि लोकायुक्त के जांच के आदेश को लंबे समय तक लटकाए रखा गया और बाद में पुलिस कर्मियों के खिलाफ दर्ज मुकदमे में क्लोजर रिपोर्ट लगा दी गई। याचिका में मामले की सीबीआई जांच मांग की गई थी। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि पुलिस के स्तर से इस मामले में जांच में गंभीरता नहीं बरती गई है। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस मामले की जांच सीबीआई से कराने के निर्देश दिए हैं।
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