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हाईकोर्ट ने पूछा, सरकार ने पांच अधिवक्ताओं को क्यों हटाया

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Wed, 28 Sep 2022 01:57 AM IST
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High court asked, why did the government remove five advocates
नैनीताल। ऊधमसिंह नगर में ब्लैकमेलिंग से जुड़े एक मामले में दायर याचिका की हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि सरकार की ओर से हाल में दायित्व से हटाए गए पांचों अधिवक्ताओं ने कोर्ट में कभी भी खराब पैरवी नहीं की थी। कोर्ट ने पूछा कि उन्हें क्यों हटाया गया, क्या कोई जांच की गई थी। कोर्ट ने तो उन्हें हटाने के लिए कभी नहीं कहा था।
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महाधिवक्ता ने इस पर कहा कि जब कोर्ट ने राज्य की ओर से गंभीरता न बरतने पर नाराजगी जताई थी तो संभवत: अधिकारियों ने इसका गलत अर्थ लगा कर इसे अधिवक्ताओं की कमी समझ लिया था। राज्य के विधि एवं न्याय सचिव वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से जबकि ऊधमसिंह नगर के एसएसपी मंजूनाथ टीसी स्वयं कोर्ट में पेश हुए। एसएसपी ने कोर्ट को बताया कि दोषी जांच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है और भविष्य में इस तरह की चूक नहीं होगी। मामले की सुनवाई एक अक्टूबर को होगी।
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न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामला रुद्रपुर में ब्लैकमेलिंग के 2019 के झूठे प्रकरण से जुड़ा है। आरोप है कि रुद्रपुर के पहाड़ गंज निवासी महबूब अली ने एक महिला के साथ मिलकर पहाड़गंज निवासी 65 वर्षीय बुजुर्ग धर्मपाल को छेड़छाड़ के आरोप में फंसाने की साजिश रची और उनसे लाखों की रुपये ऐंठ लिए। पुलिस ने आरोपी महबूब अली के खिलाफ धारा 384, 504, 506 व 34 के तहत मामला दर्ज कर मामले की जांच सब इंस्पेक्टर मुकेश मिश्रा को सौंप दी। पीड़ित की ओर से जांच अधिकारी को साक्ष्य के तौर पर इस प्रकरण से जुड़ी एक पेन ड्राइव भी सौंपी गई।
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आरोपी की ओर से वर्ष 2021 में उच्च न्यायालय में जमानत याचिका दायर की गई। प्रकरण की सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जांच अधिकारी की ओर से जो जवाब दायर किया गया था उसमें आरोपियों की पेन ड्राइव से जुड़ी ऑडियो रिकार्डिंग के बारे में उल्लेख नहीं है। अदालत के संज्ञान में आया कि आरोपी कोरोना महामारी के चलते पेरोल पर है और अब भी पेरोल पर ही है। कोर्ट ने सरकार से इस मामले में रिपोर्ट पेश करने के लिए कहा था।
सरकार की ओर से इस मामले में कोई जवाब नहीं दिया गया। पूर्व में कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि 30 जून 2022, 14 जुलाई 2022, 15 जुलाई 2022 व 01 सितंबर 2022 को कोर्ट के आदेश के बाद भी सरकार की ओर से इस मामले में जवाब नहीं दिया गया। कोर्ट ने सरकार के कामकाज पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा था कि सरकार जमानत संबंधी मामलों के निस्तारण में कोर्ट का सहयोग नहीं कर रही है। टिप्पणी की थी कि सरकार ‘सब चलता है’ के रवैये पर काम कर रही है जो कि कानून के राज में बेहद खतरनाक है।

इसके बाद सचिव कानून ने उपमहाधिवक्ता अमित भट्ट, शेर सिंह अधिकारी, विनोद कुमार जैमनी, वाद धारक सिद्घार्थ बिष्ट और मीना बिष्ट की आबद्धता समाप्त कर दी थी। मंगलवार को अदालत ने कहा कि इन पांचों अधिवक्ताओं ने कोर्ट में कभी भी खराब पैरवी नहीं की। उन्होंने हमेशा कोर्ट में वही तथ्य रखे जो उनको संबंधित अधिकारी की ओर से उपलब्ध कराए गए। इस संबंध में लॉ रिमेंब्रेशर (एलआर) वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से पेश हुए, उन्होंने कहा कि पांच अधिवक्ताओं की आबद्धता को शासन की ओर से समाप्त किया गया है।
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