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अंग्रेजों ने सालम में मक्का की खेती नष्ट कर मूसल तोड़ डाले थे
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तेज सिंह धानक।
- फोटो : ALMORA
अल्मोड़ा। अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजों ने सालम के गांव-गांव में पहुंच कर ग्रामीणों पर बेइंतिहा जुल्म ढाए थे। सालम के चौकुना निवासी 87 वर्षीय बुजुर्ग तेज सिंह धानक तब महज नौ साल के थे। आप सोचिए की उस समय अंग्रेजों ने किस कदर अत्याचार किए होंगे कि नौ वर्ष के बालक के जेहन में 78 साल बाद भी उस खौफनाक दिन की तस्वीरें आज भी ताजा हैं।
बकौल, तेज सिंह धानक वह भादो का महीना था। हथियारों से लैस अंग्रेज गांव में घुस आए। ग्रामीण कुछ समझ पाते अंग्रेजों ने ग्रामीणों को पकड़-पकड़ कर प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। गांव के कई घरों, गौशाला को आग के हवाले कर दिया। घरों में रखा अनाज, बिस्तर भी जला दिया। घरों में दूध, दही के मटके भरे थे। अंग्रेजों ने कुछ खाया तो कुछ फेंक दिया। मूसलों को हथियार समझ कर तोड़ दिया। खेतों में तैयार मक्का की फसल भी नष्ट कर दी और खेतों में आग लगा दी थी। तेज सिंह धानक बताते हैं अंग्रेजों का तांडव देखकर हमने उन पर पत्थर फेंका तो उनका पारा चढ़ गया और लोगों को दौड़ा लिया। गांव के बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं गांव से भागकर जंगलों में छिप गए। गांव से ग्रामीणों के भाग जाने पर अंग्रेजों ने कई राउंड और हवाई फायरिंग की। दूसरे दिन सुबह अंग्रेज पास के गांव बरम पहुंच गए। इस बीच कई क्रांतिकारी नौ अगस्त 1942 की रात नौगांव (बिरखम) में एकत्रित होकर आंदोलन की रणनीति तय कर रहे थे। तभी सूचना मिलने पर पटवारी मौके पर पहुंचा और क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया। इस बीच गोलीबारी में शेर सिंह घायल हो गए। इस घटना के बाद सालम में आक्रोश की चिंगारी फूट गई। जैंती में एक डाकखाने को जला दिया गया। इसकी सूचना तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर को मिली तो उन्होंने हथियारों से लैस सिपाहियों की टुकड़ी सालम में भेज दी। 25 अगस्त 1942 को क्रांतिकारी जैंती तहसील के धामद्यो में एकत्रित हुए। इसी बीच हथियारों से लैस अंग्रेजी सेना वहां पहुंच गई। युद्ध में नर सिंह धानक अंग्रेजों की गोली लगने से मौके पर ही शहीद हो गए तो दूसरे क्रांतिकारी टीका सिंह कन्याल भी गोलीबारी में घायल हो गए। इलाज के दौरान वह भी शहीद हो गए।
अब आंदोलनों में पुरानी जैसी धार कहां
रानीखेत। आंदोलनों में बड़ी ताकत होती है। लेकिन अब आंदोलनों में पुरानी जैसी धार नहीं रह गई है। कोई भी आंदोलन हो अब लोग इनसे परहेज करने लगे हैं। एकजुटता दिखाई नहीं देती। आंदोलनों की ताकत के बूते ही देश को अंग्रेजों की गुलामी से निजात मिली थी। 84 वर्षीय वरिष्ठ कारोबारी पूर्व सैनिक मदन सिंह बिष्ट ने कहा कि असहयोग आंदोलन हो या 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन, एक आह्वान पर पूरे देश के लोग एकजुट हो जाते थे। आंदोलनकारियों की ताकत की बदौलत ही देश आजाद हो सका था। वर्तमान में आंदोलन होते हैं, लेकिन यह आंदोलन सरकारों को हिला तक नहीं पाते हैं। रानीखेत जिले के लिए ही दर्जनों आंदोलन हो चुके हैं, लेकिन सरकार टस से मस नहीं हो सकी है। आजादी के आंदोलन को लेकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी 1926 में यहां ताड़ीखेत पहुंचे थे, उनके आह्वान पर इतना दम था कि रानीखेत उपमंडल के आंदोलनकारी एक मंच पर एकत्रित हो गए थे। वर्तमान में बिजली, पानी सहित तमाम मुद्दों को लेकर आंदोलन होते हैं, लेकिन आंदोलनों में पुरानी जैसी धार नहीं दिखाई देती।
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बकौल, तेज सिंह धानक वह भादो का महीना था। हथियारों से लैस अंग्रेज गांव में घुस आए। ग्रामीण कुछ समझ पाते अंग्रेजों ने ग्रामीणों को पकड़-पकड़ कर प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। गांव के कई घरों, गौशाला को आग के हवाले कर दिया। घरों में रखा अनाज, बिस्तर भी जला दिया। घरों में दूध, दही के मटके भरे थे। अंग्रेजों ने कुछ खाया तो कुछ फेंक दिया। मूसलों को हथियार समझ कर तोड़ दिया। खेतों में तैयार मक्का की फसल भी नष्ट कर दी और खेतों में आग लगा दी थी। तेज सिंह धानक बताते हैं अंग्रेजों का तांडव देखकर हमने उन पर पत्थर फेंका तो उनका पारा चढ़ गया और लोगों को दौड़ा लिया। गांव के बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं गांव से भागकर जंगलों में छिप गए। गांव से ग्रामीणों के भाग जाने पर अंग्रेजों ने कई राउंड और हवाई फायरिंग की। दूसरे दिन सुबह अंग्रेज पास के गांव बरम पहुंच गए। इस बीच कई क्रांतिकारी नौ अगस्त 1942 की रात नौगांव (बिरखम) में एकत्रित होकर आंदोलन की रणनीति तय कर रहे थे। तभी सूचना मिलने पर पटवारी मौके पर पहुंचा और क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया। इस बीच गोलीबारी में शेर सिंह घायल हो गए। इस घटना के बाद सालम में आक्रोश की चिंगारी फूट गई। जैंती में एक डाकखाने को जला दिया गया। इसकी सूचना तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर को मिली तो उन्होंने हथियारों से लैस सिपाहियों की टुकड़ी सालम में भेज दी। 25 अगस्त 1942 को क्रांतिकारी जैंती तहसील के धामद्यो में एकत्रित हुए। इसी बीच हथियारों से लैस अंग्रेजी सेना वहां पहुंच गई। युद्ध में नर सिंह धानक अंग्रेजों की गोली लगने से मौके पर ही शहीद हो गए तो दूसरे क्रांतिकारी टीका सिंह कन्याल भी गोलीबारी में घायल हो गए। इलाज के दौरान वह भी शहीद हो गए।
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अब आंदोलनों में पुरानी जैसी धार कहां
रानीखेत। आंदोलनों में बड़ी ताकत होती है। लेकिन अब आंदोलनों में पुरानी जैसी धार नहीं रह गई है। कोई भी आंदोलन हो अब लोग इनसे परहेज करने लगे हैं। एकजुटता दिखाई नहीं देती। आंदोलनों की ताकत के बूते ही देश को अंग्रेजों की गुलामी से निजात मिली थी। 84 वर्षीय वरिष्ठ कारोबारी पूर्व सैनिक मदन सिंह बिष्ट ने कहा कि असहयोग आंदोलन हो या 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन, एक आह्वान पर पूरे देश के लोग एकजुट हो जाते थे। आंदोलनकारियों की ताकत की बदौलत ही देश आजाद हो सका था। वर्तमान में आंदोलन होते हैं, लेकिन यह आंदोलन सरकारों को हिला तक नहीं पाते हैं। रानीखेत जिले के लिए ही दर्जनों आंदोलन हो चुके हैं, लेकिन सरकार टस से मस नहीं हो सकी है। आजादी के आंदोलन को लेकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी 1926 में यहां ताड़ीखेत पहुंचे थे, उनके आह्वान पर इतना दम था कि रानीखेत उपमंडल के आंदोलनकारी एक मंच पर एकत्रित हो गए थे। वर्तमान में बिजली, पानी सहित तमाम मुद्दों को लेकर आंदोलन होते हैं, लेकिन आंदोलनों में पुरानी जैसी धार नहीं दिखाई देती।
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